इन पहाडों की भव्यता देखनी है, तो इन्हें एक दूरी से देखना चाहिए; इनके रूप को समझना है, तो इसके चारों ओर भ्रमण करना चाहिए; इनके विभिन्न मुद्राओं को अनुभव करना है, तो इन्हें सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय देखना चाहिए। परन्तु, असल में, इनके अखंड एवं संपूर्ण स्वरूप को जानने के लिए मनुष्य को एक गुरु, एक प्रबुद्ध व्यक्ति की कृपा और आर्शीवाद के साथ इनकी यात्रा करनी चाहिए।
कैलाश पर्वत, ब्रम्हाण्ड के आघ्यात्मिक केंद्र के रूप में जाना जाता है, यह हिंदू, बौद्ध, जैन, बौनपॉस आदि के लिए समान रूप से पूजनीय है। हिंदूओं की मान्यता है कि इस अद्भुत चोटी पर भगवान शिव का वास है जो नित्य घ्यान में लीन हैं, जिसके प्रभाव से यह समूचा ब्रम्हाण्ड चलता है। तिब्बतीयों ने इस अलौकिक शिला को “बर्फ का अनमोल रत्न” नाम दिया है। तिब्बत के महान दिव्यदर्शी, संत तथा कवि मिलारपा ने यहीं पर बौध धर्म पर एक लाख्र कवितायें लिख्री थीं। जैन मानते हैं कि कैलाश पर्वत वह स्थान है जहाँ पर उनके पहले तीर्थांकर को आत्मज्ञान हुआ था। प्राचीन बौन धर्म का मानना है कि उनके पैगम्बर यहीं पर स्वर्ग से प्रकट हुए थे।
तिब्बती परंपरा के अनुसार, जब कभी एक खास संख्या में सिद्ध प्राणी यहाँ एकत्रित होते हैं, तब गौतम बुद्ध स्वयं यहाँ प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं।
सद्गुरु तीर्थ यात्रियों को कैलाश पर्वत के सौंदर्य तथा पवित्रता की ख्रोज करने का दुर्लभ सौभाग्य प्रदान करते हैं। गहन ध्यान एवं सत्संग के बीच इन पहाडों के और इन में बसे ऋषि मुनियों की विस्फोटक शक्ति के बीच आप जीवन की प्रचण्डता और अपने परम सामर्थ्य से अवगत हो पाएंगे।
कैलाश पर्वत से बीस किलोमीटर दूर विश्व की सबसे सुंदर एवं पवित्र झील मानसरोवर झील का दर्शन होता है। तिब्बती इसे “अजेय झील” के नाम से संबोधित करते हैं। 15,015 फीट की उँचाई पर स्थित, यह झील विश्व में स्वच्छ जल का उच्चतम स्त्रोत है। इस नीली-हरी झील को अनेक उपचारात्मक गुणों का श्रेय दिया गया है।
कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील का रास्ता यात्रियों को नेपाल और तिब्बत से ले जाता है। यहाँ पर मंदिरों, स्तूपों, प्राचीन वास्तुकला और रंगीन बाजारों की लंबी शृंख्रला में घूमने का आनंद उठाया जा सकता है।