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प्रश्नकर्ताः सद्गुरु, भारत देश आध्यात्मिकता के लिए प्रसिद्ध है, और यह देश ऐसे कई आध्यात्मिक गुरुओं का साक्षी भी रहा है जिन्होंने मानव-जाति के उत्थान के लिए बहुत काम किया है। आज भी, आप हमारे बीच यहाँ मौजूद हैं तथा और भी कई अन्य गुरु हैं। फिर भी भारत की हालत इतनी बुरी है। ऐसा क्यों?
सद्गुरु -
आज भारत की जो स्थिति है वह ऐसी इसलिए है क्योंकि आज भी यह ईश्वर के ही हाथ में है। जब तक तुम इसे अपने हाथों में लेकर इस देश में कुछ सार्थक कार्य नहीं करोगे, तब तक यह ऐसा ही रहेगा, या और भी बदतर हो जाएगा। अब, अगर तुम वास्तव में राष्ट्रीय स्थिति या अपनी सामाजिक स्थिति के बारे में चिंतित हो, तो यह अत्यंत आवश्यक है कि तुम पूरी तरह से समर्पित होकर इसे अपने हाथों में ले लो, और वास्तव में इस संबंध में कुछ करो।
जब मैं केवल 15 वर्ष का था, तब मैंने स्वामी विवेकानंद का कहा एक वाक्य पढा, जिसमें उन्होंने कहा था, “मुझे ऐसे 100 व्यक्ति दो जो सचमुच समर्पित हों, मैं इस देश की दशा बदल दूँगा।” इससे मुझे बहुत शर्म महसूस हुई। हम सब जिसकी कामना करते हैं, उस स्वप्न को पूरा करने के लिए इतने बडे देश में उन्हें सौ लोग भी नहीं मिल सके जो इसके लिए प्रतिबद्ध होकर काम कर सकें? विवेकानंद जैसे महापुरुष हर रोज नहीं आते और जब वे आए, तब उन्हें 100 व्यक्ति भी नहीं मिल पाए, कितनी शर्म की बात है। उनके लिए नहीं, परन्तु एक राष्ट्र के रूप में हमारे लिए यह कितनी शर्म की बात है। उस दिन के बाद से ही मैंने सोचा, कम से कम विवेकानंद को एक श्रद्धांजली के रूप में, हमें ऐसे 100 व्यक्ति तैयार करने चाहिए जो सचमुच समर्पित हों। और आज मैं बहुत गर्व और खुशी से कह सकता हूँ कि आज हमारे पास ऐसे सैंकडों व्यक्ति हैं जो यह बदलाव लाने के लिए सचमुच प्रतिबद्ध हैं। (दर्शक ताली बजाते हैं) इस परिवर्तन की शुरूआत हो गयी है, लेकिन यह बदलाव काफी नहीं है। मैं देख्र रहा हूँ कि सौ व्यक्ति पर्याप्त नहीं हैं। आज हमें लाखों लोगों की जरूरत है जो वाकई समर्पित हों, केवल तभी इस देश में कुछ सचमुच सार्थक घटित होगा।
आज यहाँ मौजूद आप सभी से मैं निवेदन करता हूँ, आपसे विनती करता हूँ और आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप जीवन के चाहे जिस भी क्षेत्र में हैं तथा आप जिस भी क्षमता में कुछ कर सकते हैं, इस देश में एक सुन्दर परिस्थिति पैदा करने के लिए कृपया अपने आप को समर्पित करें। कुछ ऐसे व्यक्ति हैं जो अपनी चारों ओर लोगों की दुर्दशा देख्रकर कहते हैं ‘यह सब ईश्वर की योजना है।’ तुम इस प्रकार के दर्शन-शास्त्र की बात कर सकते हो, क्योंकि तुम्हारा पेट भरा हुआ है और जीवन सुख्रद है। जब तुम्हारा पेट खाली रहता है, तब अपना भोजन प्राप्त करने के लिए तुम्हें अपनी ही योजना बनानी पडती है। क्या ऐसा नहीं है? अब कुछ लोगों के लिए जीवन बहुत सुखद है, वे लोग कह रहे हैं, ‘यह सब ईश्वर की योजना है’।
अब, अगर एक बार तुमने जीवन के एक अंश को अपने हाथों में ले लिया, तो तुम दूसरे अंश को किसी और व्यक्ति के ऊपर नहीं छोड सकते हो। उदाहरण के लिए, अभी इस देश की विशाल जनसंख्या इसके लिए एक अभिशाप है। यह सब ईश्वर की योजना नहीं है, यह सिर्फ गैर-जम्मेदारीपूर्वक किया गया प्रजनन है। चिकित्सा विज्ञान और ऐसी अन्य कई प्रणालियों की सहायता से तुमने कुछ हद तक अपनी मृत्यु को अपने हाथों में ले लिया है, अपने वश में कर लिया है। जब तुमने अपने मृत्यु पर नियंत्रण पा लिया है, तो तुम्हें अपने जन्म को भी अपने नियंत्रण में ले लेना चाहिए, है कि नहीं?
अब, तुम मृत्यु को तो अपने नियंत्रण में रखना चाहते हो, पर तुम चाहते हो कि जन्म भगवान के नियंत्रण में हो - यह कारगर नहीं होगा। दोनों को भगवान के नियंत्रण में छोड दो, भगवान संतुलन कायम रखेंगे। इस देश में तुम जिन विपत्तियों को देखते हो वह ईश्वर की योजना नहीं हैं। ये विपत्तियाँ मनुष्य की निर्दयता के कारण हैं। इसका कारण गैर-जिम्मेदाराना तरीके से, लापरवाहीपूर्वक जीवन जीना के कारण है - यही सबसे बडी विपत्ति या हादसा है। जब तुम इस एक विपत्ति से निपट लेते हो फिर कोई और विपत्ति नहीं आएगी।
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