सद्गुरु क्या वाकई ईश्वर है?

प्रश्नकर्ताः
सद्गुरु क्या वाकई ईश्वर है?

सद्गुरु -

स्पष्ट है कि तुम यह सवाल इसलिये कर रहे हो क्योंकि यह अब तक तुम्हारे अनुभव में नहीं है। यदि मैं “हाँ” कहूँ तो भी तुम असलियत के नजदीक नहीं पहुँचोगे। और अगर मैं “ना” कहूँ तो भी तुम असलियत के नजदीक नहीं पहुँचोगे। एक सुंदर कहानी है...एक दिन, गौतम बुद्ध, लोगों की विशाल सभा में बैठे हुए थे। प्रातः काल का समय था, सूरज अभी चढा भी नहीं था। एक आदमी आया। वह आदमी बहुत बडा भक्त था। वह ना केवल अक्सर मंदिर जाया करता था बल्कि उसने खुद अनेक मंदिर भी बनवाए थे। वह राम भक्त था। हर समय “राम, राम, राम, राम,” का जाप करता रहता था। उसके कपडों पर भी ‘राम, राम’लिखा होता था। तुमने तो इस तरह के दृश्य देखा ही होगा। उस भक्त ने अपनी पूरी जिंदगी में ‘राम’ शब्द के अलावा किसी अन्य शब्द का उच्चारण नहीं किया था। उसने भगवान को ही अपना चौबीसों घंटे का पेशा बना लिया था।


उसकी उम्र होती जा रही थी, सारी जिंदगी ऐसे ही गुजरती जा रही थी, कि एक दिन उसके मन में एक छोटा-सा संदेह पैदा हो गया, “मान लो कोई भगवान ही नहीं है, तब तो मेरी सारी जिंदगी ‘राम, राम’ कहने में व्यर्थ चली जाएगी।” तुम्हें इस तरह की समस्याओं का सामना नहीं करना पडेगा क्योंकि तुम तो होशियार हो। सुबह के पाँच मिनट और शाम के पाँच मिनट, बस तुम्हारी भक्ति यहीं पर खत्म हो जाती है। तुम ने तो भगवान को बीमा बना रखा है। तुम सब कुछ करते हो; और यदि कहीं कुछ गडबड हो जाए तो तुम कह सकते हो, “मैंने अपने बीमा का ‘प्रीमियम’भर दिया है।”(सभी हँसते हैं) लेकिन यदि तुम अपनी सारी जिंदगी भगवान के नाम करते हो तो कभी ना कभी यह सवाल उठ खडा होगा – “क्या मैं अपनी जिंदगी इसमें व्यर्थ गवाँ रहा हूँ? या फिर, क्या सचमुच भगवान हैं?” बस उसे जरा-सा शक हुआ क्योंकि ऐसे कुछ लोग हैं जो भगवान को नहीं मानते। उसने सोचा, “उनके लिए भी तो हर रोज सूर्योदय होता है; उनके लिए भी फूल खिलते है; उनके लिए भी हर बात वैसी ही होती है जैसे मेरे लिए; और लगता है कि उनकी जिंदगी मेरी जिंदगी से बेहतर है।” इसलिए एक छोटा-सा शक पैदा हो गया,“मान लीजिए कि भगवान नहीं हैं तब तो मेरी सारी जिंदगी व्यर्थ चली जाएगी।”जिंदगी भर इतना बडा भक्त होने के बाद, इस तरह का सवाल करना काफी मुश्किल था। इसलिए, वह गौतम बुद्ध के पास गया। सूर्योदय से पहले, सुबह-सुबह जा कर एक कोने में खडा हो गया और यह अनिवार्य सवाल किया, “क्या वाकई भगवान है?” गौतम ने उस आदमी की ओर देखकर साफ-साफ कहा, “नहीं है”। सभी शिष्यों ने “उ...फफ!” कहा। एक बडी राहत मिली, क्योंकि उन्होंने गौतम से कई बार पूछा था,“भगवान हैं या नहीं हैं?”जब कभी भी उन्होंने यह सवाल किया तब गौतम चुप रह जात थे। आज पहली बार उन्होंने साफ शब्दों में कहा,“भगवान नहीं हैं।”बस खबर फैल गयीः “बुद्ध ने कह दिया है कि भगवान नहीं है।” दिन भर खुशियाँ मनायी जा रही थीं। हर जगह यह खुशी फैलती जा रही थी। जरा कल्पना करो कि यदि भगवान नहीं हैं, तो तुम्हारी जिंदगी तो पूरी तरह से तुम्हारी ही हो जाएगी न! कोई बैठकर तुम्हारे कर्मों का हिसाब किताब नहीं लिख रहा, कोई हिसाब नहीं लगा रहा कि तुम्हें नर्क में क्या-क्या यातनाएँ भुगतनी पडेगी - ऐसी कोई भी बात नहीं रहेगी।

दिन अच्छी तरह बीत गया। शाम को एक दूसरा आदमी आया। वह चार्वाक था, चार्वाक पूर्ण रूप से भौतिकवादी होते हैं। अपनी आँखों से देखे बिना वे किसी बात पर भरोसा नहीं करते। भारत ही ऐसा एकमात्र देश है जहाँ इस तरह के लोगों को भी अपना जीवन बसर करने का मौका दिया जाता है। आज भी तमिलनाडु में, यह एक सक्रिय संस्कृति है। भगवान के संदेश को फैलाने की कोशिश में जिस तरह ईश्वर-दूत गाँव-गाँव जाकर प्रचार करते हैं, उसी तरह“ईश्वर नहीं है”का प्रचार करने वाले दूत भी गाँव-गाँव जाकर लोगों को यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि भगवान नहीं है। अब यह व्यक्ति एक निपुण चार्वाक था। चाहे तुम किसी भी किस्म के भक्त हो, यदि तुम उस व्यक्ति के साथ दस मिनट बात करो तो वह तुम्हें यह साबित कर देगा कि भगवान नहीं हैं। हजारों लोगों को उसने“ईश्वर नहीं है” साबित कर दिखाया था। उम्र होती जा रही थी। उसके मन में बस एक छोटा-सा शक पैदा हो गयाः “अगर भगवान हैं, फिर मेरा क्या हेागा? ये सभी भगवान को मानने वाले कह रहे हैं कि उसके पास हर प्रकार की यातनाएँ देने के उपकरण रखे हुए हैं। अतः, जब मैं वहाँ जाऊँगा तो वह मेरे साथ कैसा व्यवहार करेगा?” वह निश्चित रूप से मानता है कि भगवान नहीं है; परन्तु, बस छोटा-सा शक - उम्र जो हो रही है... अब यहाँ एक प्रबुद्ध व्यक्ति है, और उससे वह इस बात की पुष्टि कर लेना चाहता था। इसलिए वह शाम को सूर्यास्त के बाद आया, कोने में खडा हो गया, छाया में, और उसने भी वही अनिवार्य सवाल किया, “क्या भगवान हैं?” गौतम ने उस आदमी की ओर देखा और कहा,“हाँ”। एक बार फिर शिष्यगण भ्रम में पड गए। सुबह ही उन्होंने कहा था कि “भगवान नहीं हैं।” अब शाम को वे ही कह रहे हैं कि भगवान हैं। मामला क्या है?

तुम चाहे मानो या ना मानो, तुम भी वही खेल खेल रहे हो। चाहे तुम यह मानो कि भगवान है, या न मानो तुम तो बस एक ऐसी बात को मान रहे हो जिसका तुम्हें कोई अनुभव नहीं है। तुम्हारी समस्या बस इतनी ही है - तुम यह नहीं मानना चाहते कि तुम्हें वास्तविकता का ज्ञान नहीं है। तुम यह भी नहीं जानते कि सृष्टि कहाँ से शुरू होती है और कहाँ खत्म होती है, तो फिर तुम कैसे जान पाओगे कि सृष्टि की रचना करनेवाला कहाँ है? जब तुम अपना स्वरूप नहीं जानते तो तुम सृष्टि की रचना करने वाले के स्वरूप के बारे में क्या जान पाओगे? तुम तो बस कुछ निरर्थक बातों पर विश्वास करते हो जिन्हें तुम्हें सांस्कृतिक तौर पर बताया गया है। अतः, विश्वास करना या अविश्वास करना दोनों अलग-अलग बातें नहीं हैं, बल्कि यह बात है सकारात्मक तौर पर विश्वास करने या नकारात्मक तौर पर विश्वास करने की। इससे तुम वास्तविकता के अधिक निकट नहीं पहुँच जाओगे। यदि तुम मेरी बात पर विश्वास करते हो, तो तुम्हें अपनी अगली चाय-पार्टी में सुनाने के लिए एक अच्छी कहानी मिल जाएगी। यदि तुम मेरी बात पर अविश्वास करते हो, तो तुम्हें कहने के लिए कोई नकारात्मक बात मिल जाएगी, लेकिन इससे भी तुम वास्तविकता के नजदीक नहीं जा पाओगे। तो तुम क्या चाहते हो? क्या तुम वाकई कुछ जानना चाहते हो या क्या तुम हमेशा ऐसे ही खिलवाड करते रहना चाहोगे?

देखो, तुम्हारे मन में रचयिता का ख्याल केवल इसीलिए आया क्योंकि तुमने रचना को देखा। यदि कोई रचना नहीं होती, तो रचयिता यानि सृष्टा के बारे में क्या कभी तुम सोचते? केवल रचना की वजह से ही तुम ने रचयिता की कल्पना की है। अतः, रचना को देखकर ही तुम्हारे मन में यह सवाल उठा। विश्वास की यह संपूर्ण प्रक्रिया तुम्हारे मन में इसीलिए शुरू हुई क्योंकि तुम इस रचना का स्वरूप नहीं समझ पा रहे थे। क्योंकि जिस तरह से यह सृष्टि है, इसका जो विस्तार है, इसकी जो विशालता है, इसकी जो भव्यता है, इसकी कोई तर्कसंगत व्याख्या तुम्हारे पास नहीं है, इसलिए एक सरल, बचकाना सा जवाब यही होगा कि कोई वहाँ, ऊपर बैठकर, सब कुछ करवा रहा है। क्योंकि तुम एक आदमी हो, तुम्हें लगता है कि भगवान बहुत विशालकाय आदमी हैं। वह एक बहुत विशालकाय महिला भी तो हो सकती है..

अगर तुम एक भैंस होते, तो भगवान तुम्हारे लिए एक विशालकाय भैंस होता - दो सींग की जगह, आठ सींगों के साथ। मैं चाहता हूँ कि तुम यह समझ लो कि तुम ने यहाँ अपने अस्तित्व को अनावश्यक अहमीयत दे रखा है। लंबे अर्से से, इस ग्रह के तथाकथित धर्म यही कहते आ रहे हैं - पूरब में नहीं, पर आम तौर पर दुनिया के दूसरे भागों में, वे कहते आ रहे हैं कि इंसान को भगवान की छवि में रचा गया है और पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र है -यही अस्तित्व में सबसे महत्वपूर्ण जगह है। क्या तुम कोपरनिकस को जानते हो? कोपरनिकस ने कहा, “पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र में नहीं है। वह तो सौर-मंडल के केंद्र में भी नहीं है” और फिर शीघ्र ही उसकी मौत हो गयी। अगली बारी थी गैलिलियो की। धर्म के विरुद्ध बोलने के इल्जाम में उसे आजीवन नजरबंद कर दिया गया। उस समय से, विज्ञान ने अनेक चीजों का अन्वेषण किया है और हम जानते हैं कि इस वक्त हम जिस सौर-मंडल में रहते हैं यह समूची रचना एक दिन खत्म हो जाएगी। ब्रह्मांड की तुलना में, यह एक बहुत ही छोटी, रिक्त जगह होगी। इस के खत्म होने से कुछ भी नहीं बदलेगा बात बस इतनी ही नहीं है कि तुम्हारे मर जाने से अस्तित्व को फर्क नहीं पडेगा - अगर पूरा ग्रह भी नष्ट हो जाए तब भी कुछ फर्क नहीं पडेगा। यदि समूचा सौर-मंडल समाप्त हो जाए तो भी कुछ फर्क नहीं पडेगा। अतः, यूँ ही अनेक चीजों की कल्पना मत करो। चूँकि तुम जीवन को अपने अनुभव के संदर्भ में ही समझ सकते हो, चूँकि तुम जीवन को किसी दूसरे तरह से नहीं बल्कि स्वयं के माध्यम से ही अनुभव कर पाते हो, अतः स्वाभाविक है कि हर चीज ऐसी प्रतीत होती है मानो तुम ही इस जीवन की बुनियाद हो।

यदि तुम केवल इस सृष्टि का अनुभव कर रहे हो, तो यह जिंदगी बहुत ही मामूली है। लेकिन इस सृष्टि के स्वयं स्रोत को ही तुम्हारे भीतर भर दिया गया है। यह काया भीतर से बनायी गयी है। यदि तुम स्वयं को सृष्टि के रचयिता के रूप में महसूस करने लगो तो यह जिंदगी असाधारण है। हाँ, तुम ही ब्रह्मांड का केंद्र हो। तुम्हारे आगे यही विकल्प है - या तो यहाँ एक रचना बनकर, माँस और हड्डियों का एक पुलिंदा बनकर जिंदगी बसर करो, या खुद एक रचयिता के रूप में जिंदगी बसर करो। प्रत्येक इंसान के आगे यही विकल्प है। फैसला आप पर है, क्योंकि दोनों यहीं विद्यमान हैं। एक रचना है, स्पष्ट है किसी ने उसकी रचना की होगी; तुम उसके रचयिता नहीं हो। तुम सृजनकर्ता नहीं हो। क्योंकि तुम इंसान हो, तुम्हें लगता है कि रचयिता कोई विशालकाय इंसान होगा। यदि तुम एक बैल होते तो, तुम एक बडे बैल के रूप में उसकी कल्पना करते और मैं तुम्हें यह बता दूँ कि वह एक बडा सांड है...सच में (सभी हँसते हैं)। सांड के ख्यालों में खो मत जाना। चूंकि तुम्हारा अनुभव हमेशा उसी संदर्भ में होता है जो तुम हो, इसलिए तुम इन सभी छवियों की रचना करने की कोशिश करते हो। यदि तुम इन छवियों को अपनी उच्चतर संभावना तक ले जाने वाले सोपान के रूप में देखते हैं, तो फिर यह बिलकुल उचित है। इस संस्कृति का यह एक खूबसूरत पहलू हैः यही एकमात्र ऐसी संस्कृति है जिसमें भगवान की कल्पना को जड या स्थायी रूप नहीं दिया गया है। एक ही परिवार के पाँच अलग-अलग लोग, पाँच विभिन्न देवी, देवताओं की उपासना कर सकते हैं और उनमें से एक ऐसा भी होगा जो किसी भी चीज पर विश्वास नहीं करता, लेकिन फिर भी उन सभी लोगों को इस संस्कृति में स्वीकार किया जाता हैं। इस संस्कृति में ‘धर्म विरोध’की कोई गुंजाइश ही नहीं है, क्योंकि इसमें भगवान का कोई एक जड या स्थायी रूप नहीं है।

यही एकमात्र ऐसी संस्कृति है जो समझती है कि भगवान हमारी स्वयं की रचना है। हम भगवान की रचना करने की संपूर्ण तकनीक जानते हैं। क्या तुम्हें मालूम है कि इस देश में ३३ करोड देवी-देवता हैं? जब आबादी ३३ करोड की थी यह उस समय की बात है। (सभी हँसते हैं) हर गाँव का अपना एक देवता होता है। अपनी एक देवी होती है। क्योंकि हम जानते हैं कि हम ही उसके रचयिता हैं। जिस किसी चीज से हमारा वास्ता होता है, उसे हम भगवान बना लेते हैं। यदि हमें नारियल का पेड पसंद आ गया तो हम उस नारियल के पेड को ही भगवान बना देंगे। यदि हम नारियल के पेड को प्रणाम कर तो किसी भी भारतवासी को यह अजीब नहीं लगेगा। ऐसा अगर कहीं और जाकर करो तो तुम्हें जंगली-गँवार मानकर तुम्हारी उपेक्षा की जाएगी। इसका संबंध सिर्फ नारियल के पेड से या मंदिर से ही नहीं है, इस संस्कृति में सिखाया जाता है कि चाहे तुम जो भी देखो पहली चीज है कि तुम्हें उसे झुक कर प्रणाम करना चाहिए। इसका कारण यह है कि वे जानते थे कि, चाहे तुम अनुभव कर पाओ या नहीं, चाहे वह व्यक्ति स्वयं अनुभव कर पाए या नहीं, उसके अंदर भी सृष्टि का स्रोत समाया हुआ है। इसलिए तुम सबसे पहले उसके आगे शीश झुकाते हो, बाद में अगर तुम्हारी इच्छा है तो तुम उसे गालियाँ दे सकते हो। (सभी हँसते हैं) बस खुद को इतना याद दिलाते रहो कि सृष्टि का स्रोत सर्वव्याप्त है। क्या वह नारियल में है? हाँ। इसलिए, यदि तुम नारियल को देखते हो तो उसे प्रणाम करो। तुम जो भी देखो, उसे प्रणाम करो, क्योंकि भले ही फिलहाल तुम उसको इस तरीके से अनुभव न कर पाओ, लेकिन धीरे-धीरे तुम उसे चेतनतापूर्वक अधिक से अधिक अनुभव करने लगोगे, ताकि आगे चलकर तुम्हारा अनुभव वैसा ही बन जाए।

तुम रचना का एक भाग हो; तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि यह रचना बाहर से नहीं बल्कि भीतर से हो रही है। तो अब, सृष्टि का स्रोत तुम्हारे भीतर ही कैद है, वह बचकर भाग नहीं सकता - जानने का यही सही वक्त है। तुम जिंदा हो, तुम सचेतन हो, तुम यहाँ बैठने लायक स्वस्थ स्थिति में हो - मृत्युशय्या तक जाने की प्रतीक्षा मत करो। वास्तविकता को जानने का यही सही वक्त है क्योंकि सृष्टि का स्रोत फिलहाल तुम्हारे अंदर कैद है; उसे घटित होने दो।

 
  • Digg
  • del.icio.us
  • Facebook
  • TwitThis
  • StumbleUpon
  • Technorati
  • Google
  • YahooMyWeb
 
ISHA FOUNDATION
Isha Foundation - A Non-profit Organization © Copyright 1997 - 2012. Isha Foundation. All rights reserved
Site MapFeedbackContact Us View our Copyright and Privacy Policy