सद्गुरु, विभिन्न प्रकार के बहुत सारे योग हैं...

जिज्ञासुः
सद्गुरु, विभिन्न प्रकार के बहुत सारे योग हैं, मैं यह कैसे जानूँगा कि मेरे लिए किस प्रकार का योग उत्तम है?

सद्गुरु -

अभी तुम्हारे अनुभव में बस इतनी हीं चीजें हैं - तुम्हारा शरीर, तुम्हारा मन, तुम्हारी भावनाएँ। तुम इन्हें कुछ हद तक जानते हो और तुम यह अनुमान लगा सकते हो कि ये तीनों चीजें जिस तरह घटित हो रही हैं, इनके घटित होने के पीछे एक ऊर्जा अवश्य होगी। है कि नहीं? बिना ऊर्जा के यह सब नहीं हो सकता है। आप में से कुछ लोगों ने यह जरूर अनुभव किया होगा; दूसरे लोग आसानी से यह अनुमान लगा सकते हैं कि इन तीनों चीजों को काम करने के लिए, इनके पीछे एक ऊर्जा जरूर होगी। उदाहरण के तौर पर, यह माइक्रोफोन मेरी वाणी की ध्वनि का विस्तार कर रहा है। अगर इस माइक्रोफोन के बारे में तुम कुछ भी नहीं जानते हो, फिर भी तुम यह अनुमान लगा सकते हो कि एक स्रोत होगा, जो इसे शक्ति प्रदान करता है। इसलिए तुम्हारे जीवन में यही चार सच्चाईयाँ हैं - शरीर, मन, भावना और ऊर्जा। केवल यही चार वास्तविकताएँ हैं। इसलिए खुद के साथ जो कुछ भी तुम करना चाहते हो, वह इन्हीं चार स्तरों पर हो सकता है। तुम जो कुछ भी करना चाहते हो उसे तुम केवल अपने शरीर, अपने मन और अपनी भावनाओं और अपनी ऊर्जा के द्वारा कर सकते हो। अगर तुम अपनी भावनाओं का प्रयोग करके परम तक पहुँचने का प्रयास करते हो, तो हम इसे भक्ति योग कहते हैं; यानि कि भक्ति-मार्ग। अगर तुम अपने विवेक का प्रयोग करके परम तक पहुँचने का प्रयास करते हो, हम इसे ज्ञान योग कहते हैं; यानि कि ज्ञान-मार्ग। अगर तुम अपने शरीर या शारीरिक कार्य का प्रयोग करते हो और परम तक पहुँचने का प्रयास करते हो, हम इसे कर्म योग कहते हैं; यानि कि कर्म-मार्ग। अगर तुम अपनी ऊर्जा को रूपांतरित करते हो और परम को उपलब्ध होने का प्रयास करते हो, हम इसे क्रिया योग कहते हैं; यानि कि आंतरिक कार्य।


यही केवल चार मार्ग हैं जिनके द्वारा तुम कहीं जा सकते हो - या तो कर्म, ज्ञान, भक्ति या क्रिया - शरीर, मन, भावना या ऊर्जा। यही केवल चार मार्ग हैं, जिनसे तुम खुद के साथ कार्य कर सकते हो। ‘नहीं, नहीं, नहीं मैं तो विश्वास के मार्ग पर हूँ, मुझे और कुछ करने की जरूरत नहीं है। ‘क्या यहाँ ऐसा कोई व्यक्ति है जो केवल सिर है, हृदय, हाथ और ऊर्जा नहीं है? क्या यहाँ ऐसा कोई व्यक्ति है, जो केवल हृदय है, और चीजें नहीं है? तुम इन चारों चीजों का एक मिश्रण हो, इनके संयोग से बने हो, है कि नहीं ? यह बस इतना ही है कि किसी व्यक्ति में हृदय पक्ष प्रबल हो सकता है, किसी व्यक्ति में मस्तिष्क प्रबल हो सकता है, किसी अन्य व्यक्ति में हाथ प्रभावशाली हो सकते हैं; लेकिन हर व्यक्ति इन चारों का सम्मिश्रण है। मात्र इतना ही है कि जब यह तुम्हारे लिए ठीक ढंग से मिलाया जाता है, केवल तभी यह तुम्हारे लिए उत्तम कार्य करता है। जो हम किसी और आदमी को देते हैं, अगर वह तुम्हें दे दिया जाय तो हो सकता है कि वह तुम्हारे लिए ठीक तरह से काम न करे; क्योंकि हो सकता है कि वह आदमी बहुत सारा हृदय और बस इतना ही सिर हो। केवल तभी जब यह ठीक अनुपात में मिलाया जाता है, तुम्हारे लिए यह काम करता है। यही कारण है कि आध्यात्मिक मार्ग पर एक जीवित गुरु पर इतना बल दिया जाता है, वह तुम्हारे लिए सही अनुपात में ठीक-ठीक मिलाकर बनाता है, अन्यथा वह प्रभावशाली नहीं होगा।

योग विद्या में एक अनूठी कहानी है। एक दिन, एक ज्ञान-योगी, एक कर्म-योगी और एक क्रिया-योगी एक साथ टहल रहे थे। प्रायः ये चार लोग कभी भी एक साथ नहीं हो सकते, क्योंकि एक ज्ञान-योगी को हरेक दूसरे योगी से पूरी नफरत होती है; यह बुद्धि का योग है। साधारण तौर पर, एक बौधिक व्यक्ति, एक चिंतन करने वाला व्यक्ति, हरेक दूसरे व्यक्ति को तुच्छ समझता है। एक भक्ति-योगी, एक भक्त, प्रेम और भावनाओं से भरा हुआ, सोचता है कि ये सभी ज्ञान, कर्म और क्रिया समय की बर्बादी है। केवल ईश्वर से प्रेम करो और सब हो जाएगा। एक कर्म योगी सोचता है कि हरेक आदमी आलसी है और उनके पास सभी प्रकार के काल्पनिक दर्शन हैं; जो करने की जरूरत है, वह कर्म है। व्यक्ति को कर्म, कर्म और कर्म करना चाहिए। क्रिया योगी हर चीजों पर बस हँसता है। संपूर्ण अस्तित्व ऊर्जा है, अगर तुम अपनी ऊर्जा को रूपांतरित नहीं करते; चाहे तुम ईश्वर की कामना करो या तुम किसी भी चीज की कामना करो, कुछ भी नहीं होने जा रहा है। इसलिए वे एक साथ नहीं हो सकते, लेकिन आज वे एक साथ टहल रहे थे। तभी बारिश होने लगी। वे जंगल में थे और बारिश होने लगी। वे आश्रय की तलाश में दौडने लगे और वहाँ पर उन्हें एक प्राचीन मंदिर मिला, उसमें केवल एक छत थी, उसके चारों तरफ कोई दीवार नहीं थी। ठीक केन्द्र में एक लिंग था। तो वे लोग आश्रय के लिए मंदिर के अंदर गए। तूफान धीरे-धीरे प्रचण्ड होने लगा और मूसलाधार बारिश होने लगी। तूफान का प्रकोप ऐसा था कि वह बस मंदिर के अंदर घुसा जा रहा था, और वे धीरे-धीरे लिंग के और नजदीक बढते जा रहे थे। और कोई तरीका नहीं बच गया था, क्योंकि तूफान बस चारों तरफ से उन्हें उडाए जा रहा था। तब तक वह और प्रचण्ड हो गया, और कोई जगह नहीं बची थी; बचने का बस एक मात्र तरीका यही था कि वे चारों लिंग का आलिंगन करें। अचानक उन्होंने महसूस किया कि कुछ बहुत भव्य घटित हो रहा है। एक भव्य उपस्थिति, एक पाँचवी उपस्थिति वहाँ पर थी। फिर उन सभी ने कहा,‘अभी ही क्यों? इतने सालों से हम आपकी खोज में लगे हुए थे और कुछ भी नहीं हुआ; अभी ही क्यों? ’तब शिव ने कहा, ‘अंततः तुम चारों एक साथ हो गए। बहुत लंबे समय से मैं इसके होने की प्रतीक्षा कर रहा था’।

 
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