एक व्यक्ति की सफलता और असफलता का कारण क्या उसकी जन्मपत्रिका होगी?..

जिज्ञासु :
एक व्यक्ति की सफलता और असफलता का कारण क्या उसकी जन्मपत्रिका होगी? संख्या-विज्ञान के अनुसार नाम बदलने से क्या उसके सकारात्मक परिणाम होंगे?

सद्गुरु -

इस भीड में, अगर एक बुद्धिमान व्यक्ति है, तो क्या तुम यह भविष्यवाणी कर सकते हो कि वह अगले पल में क्या करने जा रहा है? क्या तुम यह भविष्यवाणी कर सकते हो? नहीं, वह कुछ ऐसा कर सकता है जिसे पहले कभी किसी ने ना किया हो। इसके लिए हरेक संभावना है, है कि नहीं? अगर यहाँ कोई बुद्धिमान व्यक्ति हो, तो इसकी हरेक संभावना है कि वह एक ऐसी घटना की रचना कर सकता है जो इस संसार में पहले कभी ना घटी हो। क्या ऐसी संभावना है? हाँ है। अब अगर यहाँ कोई मूर्ख हो, तो जैसे ही तुम उसे देखोगे, उसी वक्त तुम यह भविष्यवाणी कर सकते हो कि वह अपना जीवन कैसे जीने वाला है। क्या ऐसा नहीं है? अब तुम्हारे लिए उन लोगों ने एक कागज के टुकडे पर इसे लिख दिया है कि तुम कैसे जीने जा रहे हो। इसका क्या अर्थ निकलता है? अनिवार्य रूप से इसका यह अर्थ बिलकुल भी नहीं है कि तुम्हारे पास बुद्धि नहीं है, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि तुमने यह निर्णय ले लिया है कि इसे प्रयोग में नहीं लाना है। ऐसा लगता है कि तुमने यह निर्णय ले लिया है कि अपनी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं करना है।


उदाहरण स्वरूप, अगर कोई आकार है, तो उस आकार से एक कंपन जुडा हुआ है; तथा उस कंपन के कारण वह एक खास गुण को प्राप्त कर लेता है। अगर मैं इस रूमाल को इस तरह से पकडूँ, तो यह एक प्रकार का कंपन प्राप्त कर लेता है। अगर मैं इसे दूसरे तरीके से पकडूँ, तो यह दूसरे प्रकार का कंपन प्राप्त कर लेता है। अगर तुम थोडे से सूक्ष्मग्राही हो, तो इसे अनुभव करके महसूस कर सकते हो। जिस तरह से इसे पकडा जाएगा, उसके अनुसार इसका कंपन भी अपने आप बदल जाएगा। हर आकार से जुडा हुआ एक अनोखा ही कंपन होता है। इसी प्रकार ग्रहों का एक खास कंपन होता है। इसके कारण, जब ग्रहों की अलग-अलग स्थिति होती है, जब इस ग्रह पर कुछ खास घटनाएँ घटती हैं, तो तुम्हारी मानसिक अवस्था पर एक खास प्रभाव पडता है।

ऐसा होता है कि, ‘अमावस्या’ और ‘पूर्णिमा’ के दौरान, वे लोग जो थोडा सा असंतुलित होते हैं, वे थोडा ज्यादा असंतुलित होने लगते हैं। क्या तुम यह जानते हो? क्या तुम इसके प्रति जागरूक हो? वे लोग जो थोडा सा असंतुलित होते हैं, इन खास दिनों पर नियंत्रण से थोडा बाहर जाने लगते हैं। क्या उन दिनों में तुम भी इस तरह से होने लगते हो? क्या हमें अमावस्या और पूर्णिमा के दिन तुम्हें पकडना पडेगा? क्या यह आवश्यक है? नहीं? जब तुम उनसे अपनी तुलना करोगे, तब तुम मानसिक रूप से अधिक शक्तिशाली हो जाओगे, जिसके कारण, चाहे चाँद जहाँ कहीं भी हो, तुम्हारे अंदर कोई बडा परिवर्तन नहीं होता। ठीक उसी प्रकार से, अगर तुम थोडे ज्यादा संतुलित हो, तो कोई भी ग्रह चाहे कहीं भी चला जाए, तुम उसी तरह से रहोगे जैसा तुम्हारा गुण है और किसी भी तुच्छ शक्ति द्वारा नियंत्रित नहीं किए जाओगे। ये सभी ग्रह और तारे, ये क्या हैं? ये सभी निर्जीव वस्तुएँ हैं, है कि नहीं? पत्थर और रेत की तरह, मात्र निर्जीव वस्तुएँ हैं। निर्जीव वस्तुएँ अधिक प्रभावशाली हैं या मानव प्रकृति अधिक प्रभावशाली है? आप लोगों को अपने मुँह खोलने होंगे और अभी मुझे बताना होगा।

जिज्ञासु :
निश्चित रूप से मानव प्रकृति, श्रीमान।

सद्गुरु :
फिर क्या समस्या है? मानव प्रकृति को निर्जीव वस्तुओं पर नियंत्रण करना चाहिए या निर्जीव वस्तुओं को मानव प्रकृति पर नियंत्रण करना चाहिए? किसको किसके ऊपर हुकूमत करनी चाहिए? किसको किसके ऊपर शासन करना चाहिए? मानव प्रकृति को निर्जीव वस्तुओं पर शासन करना चाहिए या निर्जीव वस्तुओं को मानव प्रकृति पर शासन करना चाहिए? मानव प्रकृति को निर्जीव वस्तुओं पर शासन करना चाहिए, है कि नहीं? फिर तारे कहीं भी जाएँ, ग्रह कहीं भी जाएँ, तुम्हें किस बात की चिंता करनी है? अगर तुम्हारी भीतरी प्रकृति स्थिर और संतुलित है, तब निश्चित ही इसकी संभावना है कि तुम अपने जीवन को उस तरह से बना सकते हो जिस तरह से तुम इसे बनाना चाहते हो।

योग का विज्ञान एक संभावना है जहाँ तुम अपने पूरे जीवन को, अपने शरीर की प्रकृति को, अपने मन की प्रकृति को, अपने जीवन की प्रकृति को, सभी चीजों को अपने नियंत्रण में ले सकते हो और इसे वैसा बना सकते हो जैसा तुम इसे बनाना चाहते हो। तुम इसे उस हद तक अपने हाथ में ले सकते हो जिससे तुम यह भी निर्धारित कर सकते हो कि तुम किस गर्भ में पैदा होने जा रहे हो। तुम में इस हद तक निर्धारित करने की शक्ति है। इसके पीछे भी एक विज्ञान है। तुम यह भी निर्धारित कर सकते हो कि तुम कब पैदा होने जा रहे हो तथा कब मरने जा रहे हो। उसके लिए भी एक विज्ञान है। यह एक भीतरी विज्ञान है और इसे हम योग कहते हैं। एक मनुष्य के लिए ऐसी संभावना है।

अब हम संख्या-विज्ञान पर आते हैं, अगर हम अपना नाम संख्या-विज्ञान के अनुसार बदलें तो क्या यह हम लोगों के लिए ठीक रहेगा? तुमने जब मुझसे यह प्रश्न पूछा, तो मुझे एक घटना याद आ गई। चार-पाँच साल पहले हम लोग तिरूपुर में एक प्रोग्राम कर रहे थे। हमारे ईशा योग प्रोग्राम में एक व्यक्ति ने भाग लिया था। जब मैंने उसका नाम-पट देखा तो उस पर “बच्चा“ लिखा हुआ था। मैं उसे “बच्चा, बच्चा” कहकर पुकारता था। योग कक्षा समाप्त हो गई और वह प्रोग्राम का अंतिम दिन था। वह आकर मुझसे मिला और कहा “आप प्रोग्राम में मुझे बच्चा, बच्चा कह रहे थे। मेरा नाम बच्चा नहीं है, बादशाह है।” मैं अपनी हँसी नहीं रोक सका। कहाँ बच्चा और कहाँ बादशाह। क्या तुम हिंदी जानते हो? ‘बादशाह’ का अर्थ है राजाओं का राजा। ‘बच्चे’ का अर्थ है एक बालक, अपरिपक्व या असक्षम। क्या कोई तुलना है? मैंने पूछा कि वह “बच्चा” क्यों लिखता है? उसने कहा, “एक संख्या-वैज्ञानिक ने मुझसे अपने नाम के अक्षरों को इस तरह से बदलने को कहा, उसने कहा कि यह मेरे लिए ठीक रहेगा, इसलिए मैं बादशाह को बच्चा लिखता हूँ।” अपने जीवन में जबकि तुम बादशाह हो सकते हो, जहाँ एक बादशाह होने की संभावना है, तुम एक बच्चा बनने का चुनाव कर रहे हो।

इन संख्याओं को किसने बनाया? क्या यह प्रकृति में था? अपनी सुविधा के लिए, कम से कम अपनी उँगलियों से गिनने के लिए, हमने संख्याएँ बनाईं। मुख्य रूप से दस उँगलियों के कारण ही ये एक से दस तक की संख्या आई। अगर हमारे पास चौदह उँगलियाँ होतीं तो हम आठ, नौ, दस, डाम, डूम.... की भी गिनती करते। चूँकि हमारे पास दस उँगलियाँ हैं इसलिए हमने अपनी सुविधा के हिसाब से, संख्याएँ इस तरह से बनाईं। वह उपकरण जिसे हमने अपनी सुविधा के लिए बनाया, क्या वह हम पर शासन कर सकता है? इसके लिए मैं एक उदाहरण देना चाहूँगा। लगभग छह-सात साल पहले मैं एक मारुति कार चलाता था और मैंने उसे बेचने का फैसला किया। एक व्यक्ति जो मेरा परिचित था उसने मुझसे कार खरीदने का फैसला किया। मैंने उसे बता दिया कि कार बहुत चली हुई है तथा उसे यह अच्छी तरह देख लेनी चाहिए और अगर फिर भी यह उसे पसंद आती है तब उसे खरीदनी चाहिए। उसने कहा, “नहीं, नहीं, किसी चीज को देखने की जरूरत नहीं है। जिस दिन तुमने यह गाडी खरीदी थी उसी दिन मैंने यह फैसला कर लिया था कि जब तुम इसे बेचने का फैसला करोगे, तब मैं इसे खरीद लूँगा।” मैंने इसका कारण पूछा और उसने बताया कि, “तुम्हारी कार का नंबर जबरदस्त है।” मुझे पता नहीं था कि मैं इतने जबरदस्त नंबर की कार चलाता हूँ। मैंने उससे कहा, “नंबर को छोडो। खरीदने से पहले तुम इसे चलाओ और देखो, अगर पसंद आती है तो तभी खरीदो।” “नहीं, नहीं, नंबर ही काफी है।” मुझे आश्चर्य हो रहा था कि एक आदमी ऐसा कैसे हो सकता है। उसने बताया कि नंबर तीन सौ तैंतीस है और उसका जन्मदिन भी तीन तारीख को होता है और उस दिन तीसरे महीने की तीन तारीख थी, इसलिए उसी दिन ग्यारह बजकर पैंतालीस मिनट पर आकर वह कार ले जाएगा। मैंने कहा कि बाजार में भाव पता कर लो और फिर पैसे देना। उस आदमी के प्रकार को देखते हुए, मैंने सोचा कि उसे यहीं तक नहीं छोडना चाहिए, इसलिए मैंने उससे कहा कि रजिस्ट्रेशन नंबर तो केवल बाहरी है, कार का असली नंबर तो उसके इंजन और चेसिस पर होगा। मैंने कहा कि रजिस्ट्रेशन नंबर तो कभी भी बदला जा सकता है, इसलिए उसे इंजन और चेजस का नंबर देखना चाहिए। अब वह बडी दुविधा में पड गया। वह अपने संख्या-विज्ञान के गुरु के पास गया और वह बताया जो मैंने कहा था कि केवल रजिस्ट्रेशन नंबर देखना ही काफी नहीं है, उसे इंजन और चेसिस नंबर भी देखना चाहिए। उसके गुरु ने उसे बताया कि उन सभी नंबरों की जरूरत नहीं है केवल रजिस्ट्रेशन नंबर ही काफी है। उस आदमी को यह भी पता नहीं था कि इंजन और चेसिस का नंबर भी होता है। जो दिखता है केवल वही जरूरी है। फिर वह आया और मुझसे बोला, “मेरे गुरु ने कहा कि यह काफी है,” और गाडी खरीद ली। उसने मुझसे कहा कि वह इसे एक लाख में खरीदेगा। जब वह पैसा लेकर आया तब उसमें एक रुपया कम लाया था क्योंकि वह निन्यानवे हजार, नौ सौ निन्यानवे रुपये देना चाहता था। मैंने कहा, “ठीक है,” लेकिन वह मुझे एक रुपया कम देने में बहुत शर्म महसूस कर रहा था और रुपयों के साथ एक बहुत बडा उपहार लेकर आया था। मैंने कहा, “ठीक है, तुम कार को खुशी-खुशी ले जाओ, मैं इसी में खुश हूँ।” एक दिन जब वह उसे चला रहा था, तब पीठ को सहारा देने वाली सीट अचानक पीछे की तरफ चली गई। जब सीट अचानक पीछे चली गई, तब वह बुरी तरह से डर गया। उसने सोचा किसी दुष्ट आत्मा ने उसे पीछे से पकड रखा है। ऐसा हुआ कि संयोगवश एक महीने के बाद मैं उसके घर पहुँचा, और बातों ही बातों में पूछा कि गाडी ठीक चल रही है या नहीं। बहुत संकोच से उसने मुझे बताया कि उसने कार बेच दी क्योंकि ऐसी बुरी घटना घट गई थी। वह यह नहीं समझ सका कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कोई सहारा देने वाली तकनीक फेल हो गई होगी।

ज्योतिष और संख्या-विज्ञान तुम्हारे जीवन पर इसलिए शासन कर रहे हैं क्योंकि तुम हमेशा भय में जी रहे हो। तुम प्रेम में, शांति में, आनंद में नहीं जी रहे हो बल्कि प्रायः भय में जीते हो। जब भय तुम्हारा आधार बना हुआ है तो मैं तुम्हें किसी भी चीज में विश्वास करने के लिए बाध्य कर सकता हूँ। “हर दिन जब तुम अपने घर से बाहर निकलते हो तो तुम्हें इस छोटी उँगली को अपने मुँह में तीन बार डालना चाहिए, अन्यथा तुम्हें मालूम नहीं कि क्या हो सकता है।” अगर मैं तुम्हें यह कहता हूँ, तो वास्तव में मुझे एक संदेहास्पद कहानी तैयार करके, तुम्हें एक कहानी के रूप में यह सुनाना चाहिए था। मैं इसे यूँ ही बोल गया। अगर मैंने यही बात एक खास गंभीरता के साथ कही होती और इसकी एक रहस्यमयी व्याख्या प्रस्तुत करता तो निश्चित रूप से तुम में से अधिकांश लोग इसे करना शुरू कर देते। और बहुत सी छोटी उँगलियाँ व्यस्त हो जातीं। तुम्हारे पास अपनी आंतरिक प्रकृति के प्रति कोई सम्मान नहीं है। निर्जीव वस्तुएँ और संख्याएँ जिनकी तुमने रचना की है, वे तुम्हारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हो गई हैं। वे तुम पर शासन कर रही हैं। वह एक चीज जो सर्वोच्च है, वह तुम्हारे भीतर है और उसके प्रति तुम्हारे पास कोई सम्मान नहीं है, तथा एक, दो, तीन, चार... अभी तुम्हारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हो गया है।

 
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