एक गृहस्थ होकर साधना करना और एक ब्रह्मचारी बनकर साधना करने में क्या अंतर है?

जिज्ञासुः
एक गृहस्थ होकर साधना करना और एक ब्रह्मचारी बनकर साधना करने में क्या अंतर है?

सद्गुरु -

अगर तुम एक गृहस्थ हो और साधना करना चाहते हो तो तुम्हें कई लोगों से अनुमति लेनी पडती है। वे अनुमति दे भी सकते हैं और नहीं भी दे सकते। उसमें कई समस्याएँ होती हैं, लेकिन अगर तुम एक ब्रह्मचारी हो तो तुम अपने लिए निर्णय ले सकते हो। जब तुम एक गृहस्थ होते हो तो कुछ खास तरह की साधनाओं को करना थोडा कठिन होता है। आवश्यक वातावरण बनाना संभव नहीं होता। तो क्या सत्य को जानने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को ब्रह्मचारी बन जाना चाहिए? नहीं। इसकी जरूरत नहीं है। अपने भीतर के सत्य को जानने के लिए क्या यह मायने रखता है कि बाह्य स्थिति कैसी है? तुम्हारी सुविधा के हिसाब से जो जरूरी है, और जो तुम्हारी जरूरतों के लिए आवश्यक है, तुम उस पर गौर कर सकते हो और इसे उस तरह से पा सकते हो।


किसी ने शादी कर ली और किसी ने ब्रह्मचर्य ले लिया। कौन सही है और कौन गलत है? या कौन बेहतर है? ऐसी कोई चीज नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति वैसा ही है जैसी उसकी व्यक्तिगत जरूरतें हैं। कुछ लोगों को शादी की जरूरत है और उनकी शादी हो जाती है। कुछ लोगों के लिए यह जरूरी नहीं है, और वे ब्रह्मचर्य ले लेते हैं। हर व्यक्ति पर एक ही नियम लागू नहीं होता। एक व्यक्ति जिसको शादी की जरूरत है अगर उसे ब्रह्मचर्य दे दिया जाए तो उसके लिए जीवन नरक बन जाएगा। एक व्यक्ति जो शादी नहीं करना चाहता, अगर बलपूर्वक उसकी शादी कर दी जाए, तो वह दूसरी तरह के नरक से गुजरेगा। यह दोनों के लिए नरक होगा और दूसरे लोग जो इसमें शामिल होते हैं उनके लिए भी।

बहुत से लोग ऐसे ही हो गए हैं, बिलकुल भेड की तरह। वे कभी इस पर विचार नहीं करते कि उन्हें शादी की जरूरत है भी या नहीं। वे बस शादी कर लेते हैं क्योंकि बाकी सभी लोग शादी करते हैं। बहुत से लोग इसे गहराई में नहीं परखते। वे यह खोज-बीन नहीं करते कि क्या सचमुच शादी की जरूरत है या नहीं। सभी लोगों की शादी होती है इसलिए वे भी शादी कर लेते हैं। तीन दिनों के बाद, वह व्यक्ति इसे नहीं झेल पाता; ऐसा नहीं लगता कि शादी के साथ-साथ जो कुछ भी आता है वह उसे संभाल सकेगा। शादी का अर्थ है जीवन शैली में बहुत सारे परिवर्तन। केवल उसके बाद ही जब व्यक्ति इन परिवर्तनों का सामना करने और उत्तरदायित्वों को लेने के लिए पूरी तरह से तैयार हो जाता है, क्या उसे इसमें प्रवेश नहीं करना चाहिए? यह एक दिन की बात नहीं है। इसके साथ बहुत सी चीजें आती हैं।

एक बार ऐसा हुआ कि एक दंपत्ति की शादी की पच्चीसवीं सालगिरह थी। और ऐसे दिन पर, चाहे रिश्ता जैसा भी रहा हो, आपसे इसे मनाने की आशा की जाती है या यूँ कहें कि इसे मनाने के लिए आप विवश होते हैं। ये सभी साल किस तरह से गुजरे हैं, यह मायने नहीं रखता, उस दिन आपको उत्सव मनाना ही पडता है, है कि नहीं? और उस आदमी की आँखों में आँसू थे, व पत्नी ने कहा, “मैं यह विश्वास नहीं कर पा रही हूँ! हमारी सालगिरह पर तुम भावुक हो जाओगे!” उसने कहा, “मेरी आँखों में आँसू आने का यह कारण नहीं है।” पत्नी के पिता एक जज थे। “पच्चीस साल पहले, तुम्हारे पिता ने मुझे यह कहकर धमकी दी थी कि मैं तुम्हारे साथ खिलवाड करता रहा हूँ और अगर मैं तुमसे शादी नहीं करता तो वो मुझ पर कुछ मुकदमे चलाते और मुझे पच्चीस साल तक जेल की हवा खानी पडती। अगर मैं अपनी बात पर अडा रहता, तो आज मैं एक आजाद आदमी हो गया होता।”

अगर कोई गलती हो जाती है तो यह दुःख का कारण बन जाती है। ऐसा नहीं है कि शादी गलत है। यह दो लोगों के लिए बाँटने का और एक साथ रहने का एक अवसर होता है। यह जीने का एक अच्छा तरीका है और इसे जीने के एक अद्वुत तरीके में परिवर्तित किया जा सकता है। चूँकि लोग पर्याप्त रूप से परिपक्व नहीं हैं, वे अत्यधिक अधिकार जताने लगते हैं - क्या कहा जाए - सबसे बडी बात तो यह है कि वे एक दूसरे से एक जीवन बनाने का प्रयास करने लगते हैं। अगर तुम्हारा अपना खुद का जीवन है तो तुम अपना जीवन एक दूसरे से बाँट सकते हो और एक साथ रह सकते हो, लेकिन लोग एक दूसरे से एक जीवन बनाने का प्रयास करने लगते हैं और तब शादी का असफल होना निश्चित है, कोर्ट-कचहरी में भले ही ना हो, लेकिन जीवन में ऐसा होना ही है। या तो तुम निरे मूर्ख व्यक्ति हो कि तुम्हें कुछ भी पता नहीं है, तुम बस आराम से रहते हो, या तुम पूर्ण समर्पण वाले एक व्यक्ति हो। अगर तुम में दूसरे व्यक्ति के प्रति समर्पण है, तो यह अच्छी तरह से चलता है या तुम वास्तव में एक दूसरे से इतना प्रेम करते हो कि तुम दोनों के बीच में सब कुछ बढया है, तो चाहे वह किसी भी तरह से हो, फिर भी सब ठीक है। अन्यथा यह बिलकुल भी संभव नहीं है। मात्र सामाजिक बाध्यताओं को लेकर दो लोग वर्षों तक चिफ रहते हैं, यह पागलपन है। इस तरह से लोग बस एक दूसरे को बर्बाद कर रहे हैं।

मैंने स्त्रियों और पुरुषों दोनों को देखा है, यह स्त्री और पुरुष दोनों के लिए सत्य है। जब वे जवान होते हैं तब उनमें ज्यादा उमंग और जीवंतता होती है। फिर वे शादी कर लेते हैं - मैंने इन प्रेमियों को कॉलेज में देखा है। उन्होंने सोचा कि वे तो एक दूसरे के लिए ही बनाए गए हैं। वे आगे बढे और भारी विरोध के बीच शादी कर ली। वे माता पिता के खिलाफ, समाज के खिलाफ चले गए और शादी कर ली। वे जोशीले और जीवंत लोग, शादी के बाद, शादी के चार-पाँच साल के अंदर, दोनों बहुत दुखी इंसान हो जाते हैं। तुम उनके चेहरों पर दुःख देख सकते हो, सारी जीवंतता चली गई। लोगों को इस तरह से देखना दुर्भाग्यपूर्ण है। क्योंकि एक बार जब तुम इससे एक ढाँचा बना लेते हो, एक बार जब तुम यह रिश्ता बना लेते हो, सारी जीवंतता चली जाती है। लोगों को इस तरह से देखना दुर्भाग्यपूर्ण है। क्योंकि एक बार जब तुम इससे एक ढाँचा बना लेते हो, एक बार जब तुम इस रिश्ते को ऐसा बना लेते हो जैसे कि जीवन में एक बहुत बडा निवेश हुआ हो, तो फिर जीवन में कुछ भी काम का नहीं रह जाता।

अगर तुम किसी से प्रेम करते हो, तो तुरंत तुम इससे एक निवेश करना चाहते हो, है कि नहीं? क्यों? तुम इससे वे सभी सुरक्षाएँ पाना चाहते हो जितना कि तुम इससे पा सकते हो, लेकिन तब यह समाप्त हो जाता है। पूरी बात बस यही है। अगर तुम प्रेम से कुछ निकालने का प्रयास करते हो, तो प्रेम चला जाएगा; केवल निकली हुई चीज बच जाएगी। दुर्भाग्यवश, सभी लोग यही करने का प्रयास करते हैं। उन्हें बहुत बडी कीमत चुकानी पडती है, लेकिन लोग सीखते नहीं हैं। लोग वास्तव में एक बडी कीमत चुकाते हैं। तुम्हारा दुःख ही सबसे बडी कीमत है जिसे तुम चुका सकते हो, है कि नहीं? और क्या शेष रह जाता है? इस प्रक्रिया में तुम अपना प्रेम और आनंद खो देते हो। सबसे बडी बात तो यह है कि तुम अपना प्यार खो देते हो। तुम्हें और कौन सी कीमत चुकानी पडती है? तुम्हें नरक में जाने की जरूरत नहीं है। यह काफी है, है कि नहीं? कम से कम, अगर तुम कॉलेज के उस प्रेम संबंध को याद करते हो तो वह तुम्हारे जीवन में आनंद का एक स्त्रोत होता। हाँ, लेकिन जब तुम्हारे सपने साकार हो गए तो तुमने इससे एक व्यापार बना लिया। वह खूबसूरत व्यक्ति, जो एक समय तुम्हारे लिए सब कुछ होता था, वह तुम्हारे लिए एक कुरूप व्यक्ति में बदल गया। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक ऐसी चीज घटित होती है, लेकिन लोग - पीढी दर पीढी - इसी तरह से बढते जाते हैं, वही काम कर रहे हैं। यह समय बदलाव का है। वास्तव में यह वक्त बदलने का है और यह निर्णय लेने का है कि तुम्हारे लिए क्या महत्व रखता है और क्या नहीं।

देखो, तुम जो भी काम करते हो, उसके परिणामों का एक पूरा प्रवाह होता है। अगर तुम एक बुद्धिमान व्यक्ति हो, तो तुम्हें यह देखना चाहिए कि उस काम के पीछे के परिणामों के संपूर्ण प्रवाह के लिए तुम तैयार हो या नहीं और फिर निर्णय लो कि वह तुम्हारे लिए आवश्यक है या नहीं। सोचो और निर्णय लो कि उन परिणामों का सामना करने के लिए और उन्हें खुशी-खुशी स्वीकार करने के लिए तुम तैयार हो या नहीं। तुम्हें इसे परखना चाहिए और फिर निर्णय लेना चाहिए। हर व्यक्ति के लिए एक ही बात तय नहीं की जा सकती।

 
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