मैं जिन चिन्ताओं का अनुभव करता हूँ, उनमें से अधिकतर मेरे रिश्तों के माध्यम से आती हैं।

जिज्ञासुः
मैं जिन चिन्ताओं का अनुभव करता हूँ, उनमें से अधिकतर मेरे रिश्तों के माध्यम से आती हैं। दूसरे लोगों से थोडी समझदारी की आशा करना, क्या उचित नहीं है?

सद्गुरु -

जब तुम इस संसार में रहते हो, यहाँ पर विभिन्न प्रकार के जटिल आदान-प्रदान होते रहते हैं। जैसे-जैसे तुम्हारा कार्य-क्षेत्र बढता है, तुम्हारे आदान-प्रदान की जटिलताएँ भी बढती जाती हैं। अगर तुम एक छोटे से कैबिन में बैठकर, मात्र एक और व्यक्ति के साथ अपने कंप्यूटर पर काम कर रहे हो, तो तुम्हें केवल थोडी सी समझ की जरूरत पडती है; लेकिन अगर तुम एक हजार लोगों का प्रबंध करते हो, तो तुम्हे हरेक व्यक्ति की एक विस्तृत समझ की जरूरत होती है। अब मान लो कि तुम एक हजार लोगों का प्रबंध करते हो और तुम चाहते हो कि ये लोग तुम्हें समझें, तब तुम कुछ भी प्रबंध नहीं कर पाओगे। तुम्हें इन हजार लोगों की सीमाओं और क्षमताओं को समझने की जरूरत होगी और वह सब करना होगा जो तुम कर सकते हो; केवल तभी तुम्हारे पास परिस्थितियों को उस तरह से मोडने की शक्ति होगी, जिस तरह से तुम उन्हें ले जाना चाहते हो। अगर तुम इस प्रतीक्षा में हो कि ये हजार लोग तुम्हें समझकर काम करेंगे, तो यह मात्र एक दिवा-स्वप्न है; यह कभी नहीं होने वाला है।

 
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