सद्गुरु मैं अपने मन से बहुत परेशान हूँ, आखिर इसकी मूल प्रकृति क्या है?...

प्रश्नः
सद्गुरु मैं अपने मन से बहुत परेशान हूँ, आखिर इसकी मूल प्रकृति क्या है? मैं ऐसा क्या करूँ जिससे मैं जीवन की उच्च संभवना के प्रति और भगवद कृपा के प्रति अपने को तैयार कर सकूँ?

सद्गुरु -

मन की प्रकृति हमेशा ही संग्रह करने की होती है। जब यह स्थूलरूप में होता है तो चीजों का संग्रह करना चाहता है, जब यह थोडा-सा विकसित होता है तो ज्ञान का संग्रह करना चाहता है। जब इसमें भावना प्रबल होती है तो यह लोगों का संग्रह करना चाहता है, इसकी मूल प्रकृति बस यही है कि यह संग्रह करना चाहता है। मन एक संग्रहकर्ता है, हमेशा कुछ न कुछ एकत्रित करना, बटोरना चाहता है। जब एक व्यक्ति यह सोचने या विश्वास करने लगता है कि वह आध्यात्मिक मार्ग पर है तो उसका मन तथाकथित आध्यात्मिक ज्ञान का संग्रह करने लगता है। हो सकता है कि यह गुरु के शब्दों का ही संचय करने लगे लेकिन यह जो भी संचित करे, जब तक कोई व्यक्ति संग्रह करने की जरूरत से ऊपर नहीं उठ जाता- चाहे वह भोजन हो, कोई चीज हो, सांसारिक ज्ञान हो, लोग हों या आध्यात्मिक ज्ञान हो - यह कोई मायने नहीं रखता कि तुम क्या एकत्रित कर रहे हो, संग्रह करने की जरूरत का अर्थ है कि अभी भी एक अधूरापन रह गया है। यह अधूरापन, अधूरा होने का भाव, इस असीमित प्राणी में बहुत गहरा बैठ गया है, इसका एकमात्र कारण यह है कि कहीं न कहीं तुम अपनी पहचान उन सीमित चीजों के साथ बना लेते हो जोकि तुम हो ही नहीं।


अगर कोई अपने जीवन में पर्याप्त चेतना लाता है, और निरंतर किसी साधना का अभ्यास करता है तो उसका यह पात्र धीरे-धीरे पूर्णतः खाली हो जाता है। चेतनता पात्र को खाली करती है, साधना पात्र को साफ करती है। जब तुम इन दोनों पहलुओं को अपने जीवन में साधते हो, जब चेतनता और साधना को एक पर्याप्त लंबे समय तक बनाए रखते हो तो तुम्हारा यह पात्र खाली हो जाता है। केवल तभी जब तुम्हारे जीवन में यह खालीपन, यह रिक्तता, यह शून्यता घटित होती है, केवल तभी तुम पर कृपा अवतरित होती है। वास्तव में बिना कृपा के कोई कहीं भी नहीं पहुँचता। अगर तुम कृपा का अनुभव करना चाहते हो, तो तुम्हें रिक्त होना होगा, तुम्हें अपने पात्र को पूरी तरह खाली करना होगा। अगर तुम एक गुरु के साथ केवल उसके शब्दों का संग्रह करने के लिए रह रहे हो, तो तुम्हारा जीवन उस चींटी से ज्यादा निरर्थक है जो शीत या वर्षा ऋतु के लिए अपने भोजन का संग्रह करती है।

अगर तुम कृपा का अनुभव नहीं करते, खुद को कृपा ग्रहण करने योग्य नहीं बनाते, कृपा को धारण करने के लिए खुद को रिक्त नहीं करते तो समझ लो कि आध्यात्मिक मार्ग पर कई. कई जन्मों तक चलना पडेगा। लेकिन अगर तुमने कृपा ग्रहण करने के लिए स्वयं को पर्याप्त मात्रा में रिक्त कर लिया है तो तुम्हारी परम प्रकृति बहुत दूर नहीं है। उसे यहीं पर अनुभव करना है, उसका यहीं पर साक्षात्कार करना है। अस्तित्व के सभी आयामों से परे जाने पर हम उस परमानन्द अवस्था में प्रवेश करते हैं। उस अवस्था को कल या किसी और जन्म में प्राप्त नह करना है। यह एक जीवंत सत्य बन जाता है।

तुम्हारे अन्दर यही मानसिकता बहुत गहरी बैठ गई है कि तुम जहाँ भी जाओ उतना संग्रह कर लो जितना कि तुम कर सकते हो। मूल रूप से तुम्हारी शिक्षा ही इसके लिए दोषी है। शिक्षा ने तुम्हें यह सिखाया कि कैसे ज्यादा से ज्यादा चीजों का संग्रह किया जाए। तुम्हें अधिक से अधिक सुनियोजित तौर-तरीके सिखाए जिससे तुम उतना संग्रह कर सको जितना कि कर सकते हो। इस संग्रह से तुम अपनी जीविका कमा सकते हो। इस संग्रह से संभवतः तुम अपने चारों तरफ के भौतिक जीवन की गुणवत्ता को कुछ हद तक बढा सकते हो; लेकिन यह संग्रह - चाहे तुमने कितना भी संचय क्यों न किया हो, यह मायने नहीं रखता। जो कुछ भी तुमने अपने मन में एकत्रित कर रखा है, वह चाहे स्थानीय बकवास हो या वैज्ञानिक जानकारी हो या तथाकथित आध्यात्मिक ज्ञान हो, वह तुम्हें मुक्त नहीं कर सकेगा। जहाँ तुम अभी हो, वहाँ से एक कदम भी तुम्हारी परम प्रकृति के पास ले जाने में असक्षम होगा। तुम्हें अपने जीवन में आवश्यक चेतना को लाने के लिए साधना या आंतरिक कार्य की जरूरत होगी। सचमुच इसका कोई विकल्प नहीं है।

अगर तुम छलांग लगाना चाहते हो, उस रेखा को लांघना चाहते हो और अगर तुम चेतना को बनाए रखने के संघर्ष से बचना चाहते हो तो तुम्हें निश्छल होना होगा। तुम्हें इतना निश्छल होना होगा कि तुम सहजतापूर्वक खुद को पूर्ण रूप से समर्पित कर सको। समर्पण कोई ऐसा कार्य नहीं है जो तुम्हें करना है, समर्पण वह चीज है जो स्वतः तब होता है जब तुम नहीं होते हो। जब तुम अपनी सारी इच्छाओं को खो देते हो, जब तुम्हारी अपनी कोई इच्छा नहीं रह जाती, जब तुम इसके लिए पूर्णतः तैयार हो गए हो कि तुम्हारे अंदर ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे तुम अपना कह सको यही वह समय होता है जब तुम पर कृपा अवतरित होती है।

लेकिन मैं हमेशा इस पर जोर दूँगा कि तुम चेतनता और साधना के मार्ग पर लगे रहो। अगर तुम सहजतापूर्वक इस रेखा को पार करते हो तो यह अद्भुत है लेकिन अगर तुम लांघने का प्रयास करते हो तो तुम पाओगे कि तुम खुद को बस धोखा दे रहे हो क्योंकि ऐसे रेखा को पार नहीं किया जा सकता। यह केवल अपने आप ही हो सकता है। यह कोई योग्यता नहीं है जिसे करने के लिए कुछ करना पडे। अगर तुम अपनी सभी क्षमताओं और अक्षमताओं को, सभी पसंदों-नापसंदों को, और बढकर, उन सभी बेकार की बातों को और तत्वों को, जिन्होंने तुम्हें यह सोचने के लिए बाध्य किया है कि “मूलतया यही मैं हूँ,” छोडने के लिए तैयार हो, अगर तुम उन सभी तत्वों को गिरा देने के लिए तैयार हो जो तुम्हारे सीमित अस्तित्व को सहारा देते हैं, तो केवल तभी तुम पर कृपा अवतरित होगी। यह कोई ऐसा काम नहीं है जिसे तुम कर सको, तुम्हें तो बस यह स्वीकृति देनी है ताकि यह स्वतः हो सके। लेकिन चेतनता और साधना की प्रक्रिया से तुम ऐसी स्थिति की रचना कर सकते हो जहाँ यह निश्चित रूप से घटित हो सकती है।

हम जिस प्रकार सोच और महसूस कर रहे हैं उससे केवल निरन्तर बंधन का यह जाल निर्मित किए जा रहे हैं। वे सारी बातें जिन्हें तुम सोचते और महसूस करते हो तथा स्वयं के बीच जब तुम एक दूरी बनाने लगते हो तो इसे ही हम चेतना कह रहे हैं। जिसे हम साधना कह रहे हैं वह एक अवसर है अपनी ऊर्जा को बढाने का ताकि तुम अपनी सीमाओं और उन सभी कमियों पर नियंत्रण बना सको जिनके कारण तुम अपने विचारों और भावनाओं में उलझ गए हो।

जब मैं पीछे मुडकर देखता हूँ तो मुझे आश्चर्य होता है कि मैं इतना कुछ बोल गया। मेरे लिए इतना कुछ बोलना स्वाभाविक नहीं है लेकिन मैं इतना कुछ बोल गया क्योंकि बोले बिना मैं ऐसे पर्याप्त लोग नहीं पा सकता था, जो मेरे साथ केवल बैठ सकें। इसलिए मैं बस बोलता ही गया, लगातार बोलता ही गया क्योंकि लोगों को अपने साथ बैठाने का एकमात्र यही तरीका है। आप में से वे लोग जो यहाँ रहते हैं, कम-से-कम उनको तो सीखना चाहिए, अपने आप को परिपक्व बनाना चाहिए तथा अपनी अंदर की संभावनाओं में प्रस्फुटित होना चाहिए ताकि मेरे साथ सहजतापूर्वक बैठ पाएँ, किसी चीज का संग्रह करने के लिए नहीं, बस बैठने के लिए। गुरु होने का अर्थ है - अपने चारों ओर के हजारों लोगों के विचारों से लदा होना। कृपया मेरे इस भार को थोडा कम करें। अपने मन की व्यर्थ बातों को बन्द करें और बस मेरे साथ बैठें।

 
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