सद्गुरु, ऊर्जा का यह खेल जो मेरे भीतर चल रहा है...

जिज्ञासुः
सद्गुरु, ऊर्जा का यह खेल जो मेरे भीतर चल रहा है, उसे मैं धारण नहीं कर पा रहा हूँ। इस पूरी प्रक्रिया में आप एक गुरु के रूप में कब आए?

सद्गुरु -

अगर तुम उसे पाना चाहते हो, जो शाश्वत है, जो सर्वव्याप्त है, जो अपने में सबको समाहित किए हुए है, फिर जो साधारण ऊर्जा तुम्हारे पास है, वह पर्याप्त नहीं है। अगर तुम ईश्वर को पाना चाहते हो, तो जो ऊर्जा तुम्हारे पास है - चारों तरफ घूमने के लिए, कुछ करने के लिए, कुछ पैसे कमाने के लिए; वह काफी नहीं है। तुम्हें बहुत अधिक ऊर्जा की जरूरत होगी। यद्यपि, तुम अपने आप को सौ प्रतिशत लगा रहे हो, उस तरह की ऊर्जा काफी नहीं है। यही कारण है कि अपनी ऊर्जा को जागृत करने के लिए सभी साधनाएँ की जाती हैं। जब तुम असीम को पाना चाहते हो, चाहे कितनी भी ऊर्जा तुम्हारे पास हो, वह पर्याप्त नहीं होगी। अब, इस सारी ऊर्जा को एक लक्ष्य की तरफ, जीवन के मात्र और एकमात्र लक्ष्य की तरफ लगाने पर, फिर एक संभावना बनती है, जिससे तुम लक्ष्य की तरफ आगे बढ सको। तुम लक्ष्य को जल्दी प्राप्त करते हो या नहीं, बात इसकी नहीं है; तुम आगे बढने लगते हो। लक्ष्य साध्य हो जाता है। कोई भी व्यक्ति जो अध्यात्म पथ पर आगे बढना चाहता है, उसके लिए यह एक बुनियादी आवश्यकता है कि जीवन के मात्र एवं एक मात्र लक्ष्य की तरफ उसकी ऊर्जा का एक अविचल प्रवाह हो, वह परम तत्व को प्राप्त करे और इससे कम किसी भी चीज के साथ संतुष्ट न हो।


अगर कोई ऐसा व्यक्ति है, जो बिना किसी विराम के, अपने आप को अभीष्ट दिशा मंर प्रवाहित करने में सक्षम है, तो वह धन्य है; लेकिन विरले ही इस तरह से लोग हो पाते हैं। अधिकतम लोग अपने जीवन को कभी आगे तो कभी पीछे, केवल झटकों में जीते हैं। कुछ क्षण के लिए दौडते हैं, फिर रूक जाते हैं, या हो सकता है कि कुछ कदम पीछे की तरफ भी रखें, फिर दौडना शुरू करते हैं, या हो सकता है कि पीछे की तरफ भी दौडें। इस तरह से, अधिकांश लोगों का जीवन व्यर्थ चला जाता है। विरले ही थोडे से ऐसे लोग होते हैं, जो एक बार जब शुरू हो जाते हैं, उनके लिए फिर रूकने जैसी को* चीज नहीं होती; वे बस चलते चले जाते हैं। जो दूसरे लोग हैं, जो‘शुरू-और फिर-खतम लोग’ हैं, उन्हें किसी व्यक्ति की जरूरत होती है, जो उन्हें हर समय चलाता रहे। उस व्यक्ति का काम यह होता है कि वह गाजर और छडी का प्रयोग एक खास संतुलन में करता है, जिसकी जब भी जरूरत पडती है। कभी-कभी छडी काम नहीं करती, फिर गाजर का प्रयोग करता है। यह ऐसा है। मेरे ख्याल से रामकृष्ण ने गुरु का वर्णन अपने ही तरह से किया है। उन्होंने तीन तरह के गुरुओं का वर्णन किया है, जो कि तीन अलग-अलग श्रेणी के डॉक्टरों की तरह होते हैं। एक तरह का डॉक्टर होता है कि वह बुलाने पर आता है और मरीज को देखता है, उसकी नाडी-परीक्षण करता है, फिर आवश्यक दवाईयाँ लिखता है और रोगी को उसे लेने के लिए कहता है। अगर रोगी उसे लेने से इनकार करता है, तो वह उस विषय में अपने लिए बिना कोई मुसीबत पाले, चला जाता है। यह डॉक्टर की निम्नतम श्रेणी होती है। ठीक इसी प्रकार, कुछ धार्मिक गुरु होते हैं, जो इसकी ज्यादा परवाह नहीं करते कि उनकी शिक्षा को महत्व दिया जाता है और अनुसरण किया जाता है अथवा नहीं। जो दूसरे तरह का डॉक्टर होता है, वह न केवल रोगी को अपनी दवाईयाँ लेने की सलाह देता है, बल्कि वह थोडा और आगे तक जाता है। अगर मरीज दवाईयों को लेने में किसी तरह की हिचक दिखाता है, तो वह उसे मनाने के लिए उसके साथ तर्क-वितर्क भी करता है। ठीक इसी तरह, ईसाई धार्मिक-गुरु, लोगों को सदाचार और सत्य के मार्ग पर चलाने के लिए बडी शिष्टतापूर्वक समझाते-बुझाते हैं, कोई कसर बाकी नहीं छोडते, इन्हें इस श्रेणी का कहा जा सकता है।

जो तीसरे और सबसे उच्च श्रेणी के डॉक्टर हैं, अगर उनका तर्क-वितर्क असफल हो जाए, तो वे अपनी मरीजों के साथ बल का भी प्रयोग करने के लिए तैयार रहते हैं। इस तरह का सलाहकार उस हद तक भी जा सकता है कि मरीज के छाती पर अपना घुटना रख कर और दवा उसके गले के अंदर उतार देता है। इसी तरह के कुछ धार्मिक गुरु भी होते हैं, जो अगर जरूरत पडी तो अपने शिष्यों के साथ बल का भी प्रयोग करते हैं, इस इरादे के साथ कि वे ईश्वर के मार्ग पर चल सकें। ये उच्चत्तम श्रेणी में आते हैं। अब, जीवन के हरेक पहलू में - यह केवल डॉक्टर और आध्यात्मिक गुरु के ही संदर्भ में नहीं है - जीवन के हरेक पहलू में, ये तीन तरह के लोग पाये जाते हैं। अगर रामकृष्ण अंतिम को सर्वोच्च मानते हैं तो वे बदनाम होने का जोखिम उठा रहे हैं। वे क्रूर कहलाने का, या बिल्कुल ही आध्यात्मिक नहीं माने जाने का जोखिम उठा रहे हैं।

अब हम यह देखते हैं कि इस तरह के गुरु होते क्यों हैं, या इनकी क्या जरूरत है? इसका कारण यह है कि तुम अपनी खुद की प्रकृति के द्वारा शायद न पहुँच सको। जरा एक मेंढक को देखना: जहाँ कहीं भी वह मच्छर देखता है, वह उधर ही जाता है। हो सकता है कि वह इस दिशा में किसी चीज का पीछा करना शुरू करे, लेकिन अगर वह अपनी तरफ एक मच्छर को आते हुए देखता है, तो फिर वह उस तरफ जाएगा, किसी और को अगर दूसरी तरफ पाता है, तो फिर वह उसकी तरफ जाएगा। अगर तुम इस तरह से चलते हो, तो तुम कहीं नहीं पहुँचोगे। ज्यादा से ज्यादा तुम अपना पेट भरोगे, बस इतना ही। अगर पेट भरना ही जीवन का एक मात्र उद्देश्य है, तो जहाँ कहीं भी भोजन मिलेगा, वहाँ तुम सूँघते हुए जाओगे। क्या तुमने कुत्तों को देखा है, वे कैसे सूँघते हुए जाते हैं? जहाँ कहीं भी भोजन होगा, जहाँ कहीं भी इंद्रिय-सुख मिलेगा, वे वहीं जाएँगे। अब जब कि तुम अध्यात्म-मार्ग पर हो, अब जब कि तुमने अपने जीवन के लक्ष्य को देख लिया है, यह आस-पास में सूँघना बंद हो जाना चाहिए, क्योंकि रास्ते में कई सारी चीजें मिलेंगी जो सुगंधित होंगी। जहाँ कहीं भी कोई चीज सुगंधित मिलती है, अगर तुम उस दिशा में मुड जाते हो, फिर तुम इस संसार में या अगले में भी, कहीं भी नहीं पहुँच पाओगे। एक आदमी जो मात्र अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना चाहता है, वह भी पूरी दिलचस्पी के साथ काम करता है; चाहे जो भी वह कर रहा होता है, है कि नहीं? एक आदमी जो पैसा बनाना चाहता है, एक आदमी जो सुखों के पीछे भागता है, वह भी उसकी तरफ जो वह चाहता है, सौ प्रतिशत तन्मयता के साथ जाता है। अगर यह ऐसा है, तो अब, जब कि तुम परम की तलाश कर रहे हो, तब तुम्हें यह पता होना चाहिए कि तुम्हें कैसे होना होगा। तुम्हें कैसे होना होगा? मैं जो भी कहता हूँ, वह उससे कम पड जाएगा, जिस तरह से तुम्हें होना चाहिए। मार्ग में कई सारी चीजें आ सकती हैं, लेकिन जो तुम चाहते हो उसके पीछे जाने के लिए तुम्हें पर्याप्त शक्तिशाली, खूब बहादुर और एक चट्टान की तरह होना चाहिए, अन्यथा, चीजें घटित नहीं होंगी।

 
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