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जिज्ञासुः मान लीजिए कि मेरा किसी के साथ घनिष्ठ रिश्ता है और वह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है, तो क्या मुझ उससे एक बेहतर समझदारी की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए?
सद्गुरु -
यही तो समझ लेना है, संबंध जितना ही घनिष्ठ होगा, तुम्हें उन्हें समझने के लिए उतना ही ज्यादा प्रयास करना होगा, लेकिन राम, तुम्हारे मामले में ऐसा नहीं हो रहा है। एक बार ऐसा हुआ कि एक आदमी था, जो कई महीनों से कोमा में था। वह कभी कोमा में चला जाता, तो कभी बाहर आ जाता था। उसकी पत्नी दिन-रात उसके बिस्तर के पास बैठी रहती थी। एक बार जब वह कोमा से बाहर आया, तो होश के उन कुछ लम्हों में उसने अपनी पत्नी को पास आने को कहा। जैसे ही वह उसके पास आकर बैठी, वह कहने लगा, ‘मैं यह सोच रहा हूँ... मेरे जीवन के सभी बुरे वक्तों में तुम मेरे साथ रही हो। जब मैं आग से जल गया था, तो तुम वहीं थी, मुझे सहारा देने के लिए। जब मेरा व्यवसाय बहुत बुरे समय से गुजर रहा था, तो तुम वहाँ पर थी, समय से बेपरवाह देर-देर तक काम किया करती थी। जब मुझे गोली लगी थी, तब भी तुम मेरे साथ थी। जब हमने एक मुकदमे में अपना घर खो दिया था, तुम बिल्कुल वहीं थी, मेरे बगल में। अब मेरा स्वास्थ्य गिरता जा रहा है, और अब भी तुम मेरे पास ही हो। अब जब मैं इन सब पर विचार करता हूँ, तो मुझे लगता है कि तुम ही मेरे लिए दुर्भाग्य लेकर आयी हो!’ बिल्कुल ऐसा ही तुम अपने साथ और अपने रिश्तों के साथ कर रहे हो। कोई तुम्हारा ज्यादा आत्मीय और प्रिय बनता है, केवल तभी जब तुम उसे बेहतर ढंग से समझने लगते हो। अगर वे तुम्हें समझने लगते हैं, तो वे रिश्ते की घनिष्ठता का आनंद लेते हैं। अगर तुम उन्हें बेहतर ढंग से समझते हो, तो तुम घनिष्ठता का आनंद लेते हो।
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