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प्रश्नकर्ताः उन लोगों से प्रेम कैसे करें जिन से हमें सबसे ज्यादा चिढ होती है?
सद्गुरु -
(हँसते हैं) उन लोगों से प्रेम कैसे करें जिन से हमें सबसे ज्यादा चिढ होती है? उनको प्रेम करने का ढोंग मत करो, बस यह समझो कि तुम को उन से चिढ होती है। तुम उन से चिढते क्यों हो? सिर्फ इसलिए क्योंकि वे तुम्हारी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते या जैसे तुम चाहते हो, वो वैसे नहीं बनते। और तुम एक ही साँस में यह दावा भी करते हो कि तुम्हें ईश्वर पर विश्वास है। अगर, तुम्हें ईश्वर पर विश्वास है, तो क्या तुम यह मानते हो कि जिस व्यक्ति से तुम्हें चिढ होती है वह भी परमात्मा की ही रचना है? और वह तो ऐसा उत्तम नमूना लगता है कि वह तुम्हारे अंदर से जहर निकाल सकता है, (हँसी) है कि नहीं? तो, अपने आप को धोखा मत दो।
लोगों से तुम्हें चिढ इसलिए होती है क्योंकि तुमने सही और गलत के संबंध में एक दृढ धारणा बना लिया है। तुमने यह फैसला कर लिया है कि जीने का यही सही तरीका है। अगर वो लोग वैसे नहीं हैं जैसा तुम उनसे उम्मीद करते हो, तो पहले तुम्हें उन से चिढ होगी, फिर तुम्हें गुस्सा आएगा, उसके बाद तुम उनसे नफरत करोगे, फिर तुम उन्हें मारना चाहोगे। ये सब स्वाभाविक प्रक्रियाएँ हैं, अगर तुम संसार के हर व्यक्ति से अपनी तरह होने की उम्मीद करते हो। अगर संसार में हर व्यक्ति तुम्हारे जैसा होता, तो क्या तुम यहाँ रह सकते थे? तुम्हारे अपने ही घर में, अगर तुम्हारे जैसा एक और व्यक्ति होता, तो क्या तुम उस घर में रह सकते थे? क्या यह संभव होता? यह बहुत अच्छा है कि संसार में हर व्यक्ति अपने-अपने ढंग का है।
हर व्यक्ति बिलकुल अनोखा है। अगर अभी तुम अपने पास बैठे व्यक्ति को ध्यान से देखो, तो तुम पाओगे कि इस पृथ्वी पर इस व्यक्ति के जैसा दूसरा मनुष्य कहीं भी नहीं है। इस पृथ्वी पर आजतक ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं हुआ, और ना फिर कभी कोई ऐसा होगा। यह हर तरह से एक अनोखा मनुष्य है। अगर तुम यह मानते हो कि इसके जैसा यहाँ केवल एक ही व्यक्ति है, तो यह बहुत कीमती वस्तु है, फिर यह तुम्हें कैसे चिढा सकता है? कृपया देखो, जो व्यक्ति तुम्हारे पास बैठा है, वह बिलकुल अनोखा इंसान है। बस इतना करो - मुडकर अपने चारों ओर देखो, तुम्हारे पास बैठे लोग बिलकुल अनोखे इंसान हैं। यहाँ इसके जैसा दूसरा कोई नहीं है, और यह एक बहुत बडा चमत्कार है। आज तुम इस मनुष्य के बगल में बैठे हो जो बिलकुल अनोखा है। - इस पृथ्वी पर इस व्यक्ति के जैसा ना कभी कोई हुआ ना ही दोबारा कोई होगा - अगर तुम यह देखते हो, फिर चिढने का प्रश्न ही कहाँ है? तुम अँधे हो, तुम बस जीवन के प्रति अँधे हो; तुमने अपनी आँखें खोलकर जीवन की ओर नहीं देखा, यही कारण है कि तुम चिढते हो। अन्यथा तुम्हें कोई चिढा कैसे सकता है?
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