प्रार्थना का क्या आधार है तथा बुरे समय में...

जिज्ञासुः
प्रार्थना का क्या आधार है तथा बुरे समय में, लोगों का झुकाव ज्यादा प्रार्थना करने की ओर क्यों होता है?

सद्गुरु -

तुम्हें इसे थोडा और गहराई में देखना चाहिए। तुम में ईश्वर को जानने की बिलकुल भी लालसा नहीं है। क्योंकि बचपन से तुम्हें लोगों ने यह सिखाया है कि अगर तुम ईश्वर से प्रार्थना करोगे तो तुम अपनी परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाओगे, ईश्वर से तुम्हारी प्रार्थना का यही आधार है। अगर तुम ईश्वर से प्रार्थना करोगे, तो धन तुम्हारे पास आसानी से आएगा, तुम स्वस्थ हो जाओगे या तुम्हारा बच्चा स्वस्थ हो जाएगा। लोगों ने तुम्हें बता रखा है कि बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है। यही कारण है कि तुम ईश्वर से प्रार्थना करते हो। यह सच्चाई है, है कि नहीं? अगर तुम्हें यह बताया गया होता कि अगर तुम ईश्वर से प्रार्थना करोगे तो तुम वह सब खो दोगे जो तुम्हारे पास है या यह कि अगर तुम ईश्वर से प्रार्थना करोगे तो तुम्हारे पास सभी अनचाही समस्याएँ आएँगी, फिर क्या तुम प्रार्थना कर रहे होते? नहीं। इसलिए तुम्हारी सारी तलाश बस आराम से खुशी-खुशी रहने और किसी तरह आगे बढते रहने की है।


अगर किसी ने तुमसे यह कहा होता कि यदि तुम एक गधे से प्रार्थना करते हो, तो तुम आनंदित हो जाओगे, तुम करते, क्या तुम नहीं करते? तुम्हारी लालसा ईश्वर को जानने की नहीं है। तुम प्रार्थना कर रहे हो या मंदिरों में जा रहे हो, इसका कारण या तो भय है या लोभ है। इसमें और ईश्वर में कोई संबंध नहीं है। तुम्हारे इस काम का बिलकुल स्पष्ट कारण तुम्हारा भय और लोभ है। ऐसा मत सोचो कि यह देवत्व की प्यास है। अपने भय और लोभ के लिए तुमने एक रास्ते की तलाश की और वह मिल गया। बस इतना ही है। यह देवत्व नहीं है। अपने जीवन में, तुम अपने भीतर के इस दिव्यता को केवल तभी जानोगे जब तुम इस जीवन को एक आनंद के रूप में अनुभव करोगे। जब तुम इस सृष्टि को आनंदपूर्ण पाओगे, केवल तभी उस शक्ति को जानने की लालसा जागेगी जिसने इसे बनाया है। हम मान लेते हैं कि तुमने एक चित्र देखा, एक कलाकारी। वह सुंदर था। जैसे ही तुमने उसे देखा, तुम यह जानना चाहते हो कि उसे किसने बनाया, है कि नहीं? तुम एक फूल को देखते हो, उसे बहुत सुंदर महसूस करते हो और अब तुम तुरंत यह जानना चाहते हो कि उसे किसने बनाया। एक बार जब तुम्हारे मन में यह प्रश्न आता है, एक बार तुम्हारे मन में यह प्रश्न उठता है, तो ईश्वर की तलाश शुरू हो सकती है। अब तुम ईश्वर की तलाश कर सकते हो। जब एक आदमी आनंदपूर्ण है, केवल तभी वह ईश्वर की तलाश कर सकता है।

अगर लोग शांति और खुशी की तलाश कर रहे हैं, तो उन्हें ईश्वर की तलाश करने की जरूरत नहीं है। पहले उन्हें अपने जीवन में शांति और खुशी पैदा करने दो। तुम्हें इसे अपने विवेक और अपनी जागरूकता से जरूर पैदा करना होगा। इसे पैदा करने के बाद, अगर तुम जीवन को एक आनंदपूर्ण अवस्था की तरह अनुभव करते हो एवं तुम्हारे मन में यह प्रश्न उठता है, “एक जीवन जो इतना आनंदपूर्ण हो सकता है, इसे किसने बनाया होगा?” तब वह मार्ग देवत्व तक जाएगा। ऐसा मत सोचो कि भय और लोभवश ईश्वर से प्रार्थना करना देवत्व की तलाश है। तुम ईश्वर से प्रार्थना नहीं कर रहे हो। इसमें कोई प्रार्थना नहीं है। जो कुछ तुम चाहते हो उसे पाने के लिए तुम कुछ भी करोगे। किसी ने तुम्हें यह प्रार्थना सिखा दी और तुम अभी इसे कर रहे हो। तुम्हारा प्रतिदिन प्रार्थना करना या जब तुम कष्ट में होते हो तो ज्यादा प्रार्थना करना, तुम्हारी सुविधा के हिसाब से होता है।

 
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