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“शिव - मैं शिव का भक्त नहीं, लेकिन शिव मेरे जीवन की साँस हैं। मैं कोई पूजा करने वाला व्यक्ति नहीं हूँ। मैंने अपने जीवन में कभी शिव या किसी की पूजा नहीं की - कभी नहीं, एक बार भी नहीं; लेकिन वह हमेशा मेरे प्राण और अस्तित्व रहे हैं।” - सद्गुरु
वैभव शिव

योग परंपरा में शिव को आदि गुरु माना जाता हैं। शिव, जिन्हें सद्गुरु हँसी-हँसी में अपना 50 प्रतिशत भागीदार कह कर संबोधित करते हैं, उनकी इशा में प्रधान भूमिका रही है। शिव की महिमा के गुणगान के लिये सद्गुरु ने अपने आप में एक अनूठे कार्यक्रम - वैभव शिव की रचना की।

ध्यानपूर्वक चुने गये सांस्कृतिक कार्यक्रम - जो पारंपरिक भारतीय तथा आधुनिक नृत्य का एक दुर्लभ मिश्रण था, जिसमें परंपरागत सांस्कृतिक प्रदर्शन, और साउंड्स ऑफ ईशा का शानदार संगीत शामिल था - ने समुचित समा बांध दिया। इस विस्तृत आयोजन में सद्गुरु ने शिव की पौराणिक कथाओं को शक्तिशाली ध्यान क्रियाओं के साथ जोड दिया। इनमें हर कथा जीवन के मूल सत्य का बयान कर रही थी। अनुभव पर आधारित इस मंथन में, सद्गुरु कभी अथाह शून्यता में, कभी असीम सर्वव्यापकता में, तो कभी शिव के प्रत्यक्ष विरोधाभास में बहुत गहराई से उतरते थे।

कार्यक्रम के दौरान सद्गुरु ने इस परम योगी को न सिर्फ प्रस्तुत किया बल्कि स्वयं को (तथा पूरे परिवेश को) शिव के एक-एक पहलू में रूपांतरित कर दिया, फिर तो उनके वास्तविक गुरु-परंपरा के बारे में कोई संदेह ही नहीं रह जाता। हमारे बीच एक ही ऐसा है जो वास्तव में यह कहने के लायक है, ”शिवो अहम्” (मैं शिव हूँ) ...
















 
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