“लीला का अर्थ हैः क्रीडा का मार्ग। क्रीडा से मेरा मतलब यह नहीं है कि हम सिर्फ ख्रेलने के लिये यहाँ पर आये हैं; हम यहाँ पर जीवन की अति गहन तथा अति गम्भीर पहलुओं को जानने के लिये आये हैं, लेकिन ख्रेल-ख्रेल में।” - सद्गुरु
लीला - क्रीडा का मार्ग
सितंबर 2005 में ईशा योग केंद्र में संपन्न एक पौराणिक और अपने आप में अनूठे कार्यक्रम लीला में सद्गुरु ने ईशा साधको की एक मंडली को कृष्ण के विविध आयामों की खोज के लिए एक रहस्यमय तथा मंत्रमुग्ध करने वाली यात्रा पर ले गये। लीला - क्रीडा का मार्ग.
हर छोटी-छोटी चीज का ध्यान रख्रते हुए, बहुत बारीकी पूर्वक रचे गए सप्ताह भर चलने वाले इस कार्यक्रम को निरंतर बदलती हुई और विस्मयकारी परिस्थितियों के बीच संचालित किया गया, जिसमें सारा परिसर रहस्यमय दृश्यों में बदल जाता था।
अद्भुत, कलात्मक तथा सांस्कृतिक प्रदर्शन - जैसे कि नृत्य, संगीत और नाटक ने इस अलौकिक लोक में जीवन फूंक दिया। यह कामुक उल्लास एक क्रीडापूर्ण ढंग था, उस चेतना को अनुभव करने के लिए जिसे कृष्ण कहा जाता है। लोगों को उस अनुभव में उतारने के लिए सद्गुरु ने सशक्त ध्यान प्रक्रियाओं द्वारा एक अनुकूल परिवेश तैयार कर दिया।