"ईशा का अर्थ है: वह जो सृष्टि का स्रोत है। क्रिया का अर्थ है ‘उस स्रोत की ओर किया जाने वाला आन्तरिक काम’। ईशा क्रिया एक साधारण पर शक्तिशाली विधि है, जो हमें असत्य से सत्य की ओर ले जाती है।"

- सद्गुरु

सुख शांति की तकनीक

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्‍न:

  • यह ध्‍यान करने से मुझे क्या फायदा है?
  • यह ध्यान करने से आखिर होता क्‍या है?
  • इसे वेब साईट पर क्‍यों सिखाया जा रहा है।
  • साँस का क्या महत्व है? अच्छी तरह साँस लेने से आदमी स्वस्थ रहता है। क्या इसके दूसरे फायदे भी हैं?
  • जरा-सा ऊपर उठे चेहरे के साथ मुझे क्यों बैठना चाहिए?
  • ध्वनि ’आ...‘(आऽऽऽ) के उच्चारण का मुझ पर क्या असर होगा?
  • ईशा क्रिया के लिए क्या खाली पेट होना चाहिए? खाने और इस क्रिया के बीच कितने समय का अंतर होना चाहिये?
  • क्या ध्यान कुछ दिनों तक ही करने की जरूरत है? या इसे जीवन भर करना होगा?
  • मैंने ईशा योग कार्यक्रम किया हुआ है और मैं इसे रोजाना करता हूँ। क्या मेरे लिए शाम्भवी महामुद्रा के साथ ईशा क्रिया करना आवश्यक है? अगर मैं दोनों करूं तो क्या यह मेरे लिए लाभदयक होगा?
  • 'आ' ध्वनि करने के बाद मुझे बहुत अच्छा लगा और मैं जीवंत महसूस करता हूँ। क्या में इस मंत्र को 7 से अधिक बार कर सकता हूँ? या क्या मैं इसे अलग ध्यान की तरह कर सकता हूँ?
  • क्‍या ईशा क्रिया का अभ्‍यास सभी कर सकते हैं? क्‍या किसी खास बीमारी में इसे नहीं करना चाहिए। मुझे सर्विकल स्पोंडिलाईटिस है। क्या यह क्रिया करने से कोई हानि तो नहीं होगी
  • क्या मैं इस ध्यान को अपने परिवार के सदस्यों और मित्रों को सिखा सकता हूँ? क्या उन्हें विडियो देखना जरूरी है?
  • जब मैं 'आ' ध्वनि करता हूँ तो मैं अपने 'गला चक्र' और 'हृदय चक्र' पर कंपन अनुभव करता हूँ लेकिन 'मणिपूरक' चक्र में नहीं। मैं क्या गलत कर रहा हूँ?
  • ईशा क्रिया के लिए क्या मैं कुर्सी पर पीठ सीधा कर के बैठ सकता हूँ? क्योंकि मैं पालथी लगाकर नहीं बैठ सकता।
  • मुझे ये ध्यान कहाँ करना चाहिए? में जहां रहता हूं वहां बहुत शोरगुल होता है। क्या मुझे ये किसी अलग जगह पर जा कर करना होगा?
  • मैंने ईशा क्रिया ऑनलाइन सीखी थी और नियमित अभ्यास कर रहा था। पर किसी कारण वश अभ्‍यास छुट गया। मैं इसे फिर से शुरू करना चाहता हूं। क्या मुझे यह दूबारा ऑनलाइन सिखना होगा या जो पहले सीखा था उसका अभ्‍यास शुरू कर दूं?
  • ईशा क्रिया करने के लिए सही समय क्या है?
  • दिन में कितनी बार ईशा क्रिया का अभ्यास करना चाहिए?
  • यह ध्यान 48 दिन तक क्यों करना चाहिए?

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  • सद्गुरुः सबसे पहले, ध्यान करने की क्या जरूरत है? यह जो जीवन-प्रक्रिया शुरू हुई, यह आपका सचेतन चुनाव नहीं था। यह बस आपके साथ हो गया। जब आप पैदा हुए, आपका शरीर कितना छोटा था और अब यह बड़ा हो गया है। यह बिलकुल साफ है कि यह शरीर आपने कहीं बाहर से इकट्ठा किया है। यह एक संग्रह है। जिसे आप ‘मेरा शरीर’ कहते हैं वह भोजन का एक ढेर है। इसी तरह जिसे आप ‘मेरा मन’ कहते हैं वह संस्कारों का एक ढेर है। आप जो भी बटोरते हैं, वह आपका हो सकता है पर वह स्वयं आप नहीं। बटोरने का मतलब ही है कि आपने कहीं और से जमा किया है। आज आप 70 किलो वजन का शरीर बटोर सकते हैं, पर आप इसे 60 किलो करने का फैसला कर सकते हैं। आप उस 10 किलो वजन को ढूँढने नहीं निकलते, क्योंकि वह तो सिर्फ एक संग्रह था। जब आप वजन कम कर लेते हैं, यह गायब हो जाता है। इसी तरह आपका मन प्रभावों व संस्कारों का एक ढेर है।

    जैसे ही आप अपने अनुभवों से अपनी पहचान बना लेते हैं, जैसे ही आप अपनी पहचान किसी ऐसी चीज से बना लेते हैं जो आप नहीं हैं, आपकी समझ, आपकी बोधन-क्षमता, पूरी तरह बेकाबू हो जाती है। आप जीवन को वैसे नहीं देख सकते जैसा वो है; अपकी ग्रहण करने की क्षमता बहुत ज्यादा विकृत हो जाती है। यह शरीर जिसे अपने बाहर से इकट्ठा किया है, जैसे ही आप इसे ‘स्वयं’ के रूप में अनुभव करने लगते हैं, जैसे ही आप अपने दिमाग पर पड़े प्रभावों व संस्कारों को ‘स्वयं’ के रूप में अनुभव करने लगते हैं, आप जीवन को उस तरह से नहीं अनुभव कर सकते जैसा वह है। आप जीवन को उस तरह से अनुभव करेंगे जैसा आप के जीवित रहने के लिए जरूरी है, वैसा नहीं जैसा वह असल में है।

    जब आपने मानव देह धारण किया है तो इसे जीवित रखना बहुत जरूरी है, पर यह काफी नहीं है। अगर आप इस ग्रह के किसी दूसरे प्राणी की तरह आए होते तब, पेट भरा कि जीवन बेफिक्र हो जाता। परंतु जब आप एक मनुष्य के रूप मे आए हैं; जीवन सिर्फ जीवित रहने तक ही सीमित नहीं है। एक मनुष्य के लिए जीवन वाकई में तब शुरू होता है जब जिंदा रहने की उसकी जरूरतें पूरी हो जाती हैं। ध्यान आपको एक अनुभव कराता है, एक आंतरिक अवस्था जहाँ ‘मेरा’ क्या हैं और ‘मैं’ कौन हूँ यह अलग-अलग हो जाता है। एक दूरी बन जाती है, आप क्या हैं और आपने क्या जमा किया है, इनके बीच एक फरक आ जाता है। फिलहाल हम इसे ही ध्यान कह सकते हैं।

    इसे करने से क्या लाभ होगा? यह आपकी समझ में पूर्ण स्पष्टता लाता है। आप जीवन को वैसे देख पाते हैं जैसा वह है, बिना किसी तोड़ मरोड़ के। अभी आप इस दुनिया में किस तरह जी रहे हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप दुनिया को कितने स्पष्ट तरीके से देख पा रहे है। यदि मुझमें समझ नहीं है केवल आत्मविश्‍वास है तो मैं मूर्ख ही साबित होऊंगा। अधिकतर लोग समझ की कमी को अत्‍मविश्वास बढ़ाकर के पूरा करने की कोशिश करते हैं। वास्तव में समझ का स्थान कोई और चीज नहीं ले सकती। जब आप को यह समझ आ जाती है तो आप स्वाभाविक रूप से ध्यान की और झुकते हैं। तब आप सभी गलत धरनाओं से मुक्त होना चाहेंगे और जीवन को वैसा ही देखेंगे जैसा वह है, क्‍योंकि तब आप जीवन डगर पर बिना किसी रूकावट के, बिना कोई ठोकर खाए चलना चाहेंगे।

  • सद्गुरुः यह क्रिया आपके और आपके शरीर, आपके और आपके मन के बीच एक दूरी बनाती है। आप जीवन में जूझ इसलिए रहे हैं, क्योंकि आपने इन सीमित रूपों के साथ अपनी पहचान बना ली है। ध्यान की खासियत यह है कि आप और जिसे आप अपना ‘मन’ कहते हैं, उनके बीच एक दूरी बन जाती है। आप जिस भी पीड़ा से गुजरते हैं, वह आपके दिमाग की रचना है; क्या ऐसा नहीं है? अगर आप खुद को दिमाग से दूर कर लेते हैं, क्या आपके भीतर पीड़ा हो सकती है? यहीं पीड़ा का अंत हो जाता है।

    जब आप ध्यान करते हैं, आपके और आपके दिमाग के बीच एक दूरी पैदा हो जाती है, और आप शांतिपूर्ण महसूस करने लगते हैं। पर समस्या यह है कि जैसे ही आप अपनी आँखें खोलते हैं, आप फिर से अपने दिमाग के साथ उलझ जाते हैं। अगर आप रोज ध्यान करेंगे, एक दिन ऐसा आएगा जब आप अपनी आँखे खोलेंगे और तब भी आप अनुभव करेंगे कि आपका दिमाग वहाँ है और आप यहाँ हैं। यह तकलीफों का अंत है। जब आप अपने शरीर और अपने मन के साथ अपनी पहचान बनाना बंद कर देते हैं, आप अपने भीतर सृष्टि के स्रोत से जुड़ जाते हैं। जैसे ही ऐसा होता है, आपके ऊपर कृपा होती है।

    चाहे आप कहीं रहें, यहाँ या किसी दूसरे लोक में, अब तकलीफों का अंत हो जाता है। इसका अर्थ यह है कि अपने कर्मों की पूरी गठरी - अपने अतीत और अचेतन मन - को किनारे कर दिया है। आपके ऊपर इनका कोई असर नहीं होता। जैसे ही पीछले कर्मों का आपके ऊपर असर समाप्त हो जाता है, तब जीवन एक विशाल संभावना बन जाता है।

    हर साँस आपके जीवन में एक महत्वपूर्ण संभावना बन जाती है, क्योंकि अब आपके वजूद पर आपके अतीत का कोई असर नहीं होता। जब आप यहाँ बैठते हैं, आप भरपूर जीवन होते हैं। जिंदगी सहज हो जाती है।

  • सद्गुरुः कुछ साल पहले, एक दिन मैं यूँ ही बैठे-बैठे, एकाएक, बिना कुछ किए, बेवजह ही आनन्द से सराबोर हो उठा। मैंने सोचा “अब इसमें मुश्किल क्या है? बस यूँ ही बैठे-बैठे, मैं आनन्द में डूबा जा रहा हूँ। इसमें मुश्किल क्या है? मैं पूरे विश्‍व को ऐसे आनन्द में डूबो दूँगा।’’ उस बात को आज 30 साल हो गए, मैं अब ऐसा हो गया हूँ (अपनी दाढी की ओर संकेत करते हुए), परन्तु लोगों ने अब तक अपना दु:खड़ा नहीं छोड़ा। हमने लाखों लोगों के जीवन को छुआ है, परन्तु पूरे विश्‍व को नहीं। पूरा विश्‍व यानी 700 करोड़ लोग।

    आजकल समाज दिन प्रति दिन उतावला होता जा रहा है, क्योंकि बाहरी सुख-सुविधा के लिए हम जो भी कर सकते हैं, वह हमने कर लिया है। अब आगे क्या किया जाय, यह किसी को नहीं मालूम। अब लोग यही करते हैं कि अलग-अलग तरह से बाल कटवाते हैं या फिर पूरे शरीर को गुँदवा लेते हैं। इसके अलावा वे दूसरा नया क्या कर सकते हैं? लोग हर रोज अधिक से अधिक जीवन-नाशक चीजें करेंगे केवल इसलिए कि वे कुछ नया करना चाहते हैं।

    तो अब समाज आध्यात्मिक प्रक्रिया के लिए तैयार है; बिल्कुल परिपक्‍व है। अगर उसे अभी यह नहीं मिला तो वह बौखला जाएगा। अभी समाज को एक ऐसी प्रक्रिया की जरूरत है जो अनेकों लोगों तक पहुँच सके, जो किसी खास धर्म से जुड़ी हुई न हो, किसी खास दर्शन-शास्त्र से जुड़ी हुई न हो - जो सहज हो और वह उन्हें भीतर की ओर ले जाए। अभी तक हमने बहुत कम लोगों को गहराई में छुआ है, यह अभी तक बड़े पैमाने पर नहीं हुआ है। आज हमारे पास जो तकनीक उपलब्ध है, इससे अब हम यह बड़े पैमाने पर कर सकते हैं।

    हमारी पीढी के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण कार्य होगा। यह हमारा सौभाग्य है कि हम इतने बड़े पैमाने पर मनुष्य की चेतना के लिए कुछ कर सकते हैं। अगर आप तकनीक का केवल बाहर में ही बहुत ज्यादा इस्तेमाल करते रहेंगे तो इस पृथ्वी का सर्वनाश हो जाएगा। अब वह समय आ गया है जब मनुष्य की ऊर्जा अंतर्मुखी हो, तभी वह अपने को दिशा दे पाएगा और बाहरी वातावरण को किसी तरह का नुकसान पहुँचाना बंद करेगा। हमें अभी भीतर बहुत काम करना है। अगर हम दुनिया के उत्साही और खूब महनती समाजों के लिए भीतरी आयाम को बहुत बड़े पैमाने पर उपलब्ध नहीं कराते, तो उनके उद्योग व कारखाने इस पृथ्वी का सर्वनाश कर देंगे।

  • सद्गुरुः सांस वो धागा है, जो आपको शरीर से बांध कर रखता है। अगर मैं आपकी सांसें ले लूं तो आपका शरीर छूट जाएगा। यह सांस ही है, जिसने आपको शरीर से बांध रखा है। जिसे आप अपना शरीर और जिसे ‘मैं’ कहते हैं, वे दोनों आपस में सांस से ही बंधे हैं। यह सांस ही आपके कई रूपों को तय करती है।

    जब आप विचारों और भावनाओं के विभिन्न स्तरों से गुजरते हैं, तो आप अलग-अलग तरह से सांस लेते हैं। आप शांत हैं तो एक तरह से सांस लेते हैं। आप खुश हैं, आप दूसरी तरह से सांस लेते हैं। आप दु:खी हैं, तो आप अलग तरह से सांस लेते हैं। क्या आपने यह महसूस किया है? इसके ठीक उल्टा है प्राणायाम और क्रिया का विज्ञान। जिसमें एक खास तरह से, सचेतन सांस लेकर अपने सोचने, महसूस करने, समझने और जीवन को अनुभव करने का ढंग बदला जा सकता है।

    शरीर और मन के साथ कुछ दूसरे काम करने के लिए इन सांसों को एक यंत्र के रूप में कई तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है। आप देखेंगे कि ईशा क्रिया में हम सांस लेने की एक साधारण प्रक्रिया का इस्तेमाल कर रहें हैं, पर क्रिया सिर्फ सांस में नहीं है। सांस सिर्फ एक उपकरण है। सांस तो एक शुरूआत है, पर जो होता है वह अद्भुत है। आप जिस तरह से सांस लेते हैं, उसी तरह से आप सोचते हैं। आप जिस तरह से सोचते हैं, उसी तरह से आप सांस लेते हैं। आपका पूरा जीवन, आपका पूरा अचेतन मन आपकी सांसों में लिखा हुआ है। अगर आप सिर्फ अपनी सांसों को पढ़ें, आपका अतीत, वर्तमान और भविष्य आपकी सांस लेने की शैली में लिखा हुआ है।

    एक बार जब आप इसे जान जाते हैं, जीवन बहुत अलग हो जाता है। इसे अनुभव करना होता है, यह ऐसा नहीं है जिसे आप प्रवचन से सीख सकते हैं। अगर आप बस यहां बैठने का आनंद जानते हैं, यानी कुछ सोचे बिना, कुछ किए बिना, बस बैठने का आनंद जानते हैं, सहज एक जीवन के रूप में बैठना, तब जीवन बहुत अलग हो जाता है।

    यह असल में क्या है, आज इसका वैज्ञानिक सबूत है कि बिना शराब की एक बूंद लिए, बिना कोई चीज लिए, आप यहां सहज बैठकर, अपने आप नशे में मतवाले व मदहोश हो सकते हैं। अगर आप एक खास तरह से जागरूक हैं, तो आप अपनी आंतरिक प्रणाली को इस तरह से चला सकते हैं कि आप सिर्फ यहां बैठने मात्र से परमानंद में चले जाते हैं। एक बार जब केवल बैठना और सांस लेना इतना बड़ा आनंद बन जाए, आप बहुत हंसमुख, विनम्र और अद्भुत हो जाते हैं, क्योंकि तब आप अपने अंदर एक ऊंची अवस्था में होते हैं। दिमाग पहले से ज्यादा तेज हो जाता है ।

  • सद्गुरुः जरा-सा ऊपर उठे चेहरे के साथ आप इसलिए नहीं बैठते हैं कि आप आसमान में तैरती कोई चीज देखना चाहते हैं या कोई कल्पना करना चाहते हैं। आप चेहरा ऊपर की ओर इसलिए रखतें हैं, क्योंकि जब आपकी प्रणाली ऊपर की ओर केंद्रित होती है, यह ग्रहणशील हो जाती है। यह एक खिड़की खोलने जैसा है। यह कृपा का पात्र होने जैसा है। जब आप इच्छुक और ग्रहणशील हो जाते हैं, आपका शरीर अपने आप ऊपर की ओर खिंचने लगता है।

  • सद्गुरुः जब आप ध्वनि ‘आ...’ का उच्चारण करते हैं, आपके शरीर का भरण-पोषण केंद्र जागृत हो जाता है। यह केंद्र मणिपूरक चक्र है। मणिपूरक चक्र आपकी नाभि से पौन इंच नीचे होता है। जब आप अपनी मां के गर्भ में थे, तब यह ‘भरण-पोषण’ नली वहां जुड़ी थी। अब नली नहीं है, पर यह भरण-पोषण केंद्र अब भी आप के नाभि में है।

    जैसा इंसान का एक भौतिक शरीर होता है, वैसे ही एक पूरा ऊर्जा शरीर भी होता है, जिसे हम आमतौर पर प्राण या जीवन शक्ति के रूप में जानते हैं। यह ऊर्जा या प्राण, शरीर में खास तरीके से चलता है, यह मनमाने ढंग से नहीं चलता। इसके चलने के 72,000 विभिन्न ढंग हैं। दूसरे शब्दों में, हमारी प्रणाली में 72,000 रास्ते हैं जिनसे यह चलता है। इन रास्तों को नाड़ियां कहते हैं। इनका कोई भौतिक रूप नहीं होता, अगर आप शरीर को काटकर और अंदर देखें तो आपको ये नाड़ियां नहीं मिलेंगी। लेकिन जैसे ही आप ज्यादा जागरूक होते जाते हैं, आप महसूस करेंगे कि ऊर्जा मनमाने ढंग से नहीं, बल्कि तय रास्तों से प्रवाहित हो रही हैं।

    जब आप ‘आ...’ का उच्चारण करतें हैं, आप देखेंगे कि कंपन नाभि से पौन इंच नीचे शुरू होकर पूरे शरीर में फैल जाता हैं। ध्वनि ‘आ...’ एकमात्र कंपन है, जो पूरे शरीर में फैलता है, क्योंकि यह अकेला स्थान है जहां 72,000 नाड़ियाँ मिलती हैं और फिर से बंट जाती हैं। ये सब मणिपूरक पर मिलती हैं और खुद को फिर से बांट लेती हैं। यह शरीर में ऐसा एकमात्र बिंदु है। अगर आप ध्वनि ‘आ...’ का उच्चारण करते हैं, उसका कंपन पूरी प्रणाली में फैल जाता हैं।

    यह कंपन आपके भरण-पोषण केंद्र को ऊर्जा से भरने में काफी मदद कर सकता है। इस केंद्र के जागृत होने से सेहत, सक्रियता, समृद्धि और कल्याण की प्राप्ति होती है।

  • खाली पेट होना आवश्यक नहीं है। खाने के तुरत बाद भी इसे किया जा सकता है। हालांकि खाना खाने के बाद पेट भरे होने से आपको नींद आ सकती है।

  • ध्यान एक प्रक्रिया है जो आपके दैनिक जीवन का हिस्सा बन सकती है, उसी तरह जैसे आप और काम करते हैं। आप मंजन करने का उदाहरण ले, शुरू में आपसे कहा गया कि ये आपको करना ही है, लेकिन जैसे ही आपने इसका महत्व समझ लिया आप इसे खुद ब खुद करने लगे, बिना इसके बारे में सोचे। यही बात ध्यान के साथ लागू होती है। जब एक बार आप इसका महत्व समझ लेते हैं तब कोई खास कोशिश किये बिना, स्वाभाविक रूप से यह आपके जीवन का एक अंग बन जायेगा । लेकिन ऐसा होने से पहले, शुरू में आपको इसे नियमित रूप से करना पड़ेगा। इसीलिए हम ज़ोर देते हैं कि बिना नागा किये इसको दिन में दो बार 48 दिन तक करना है ।

  • यह बहुत अच्छा है अगर आप हर रोज दोनों कर सकते हैं। आपको निश्चित रूप से उनका लाभ होगा। हालांकि, अगर आपके पास समय की कमी है, तो यह बेहतर होगा कि आप शाम्भवी महामुद्रा को अहमियत दें।

  • यदि आप चाहें तो ईशा क्रिया दो बार कर सकते हैं, लेकिन यदि आप यह मंत्र ज्यादा देर तक करना चाहते हैं तो 'ॐ' ध्‍वनि करना अधिक उचित होगा। यदि आप ईशा योग केंद्र आएं तो आपको इस मंत्र को करने की विधि सिखाई जा सकती है। इसे हर रोज़ 12.15 से 1.30 के दौरान सिखाया जाता है। नहीं तो आप ईशा योग अपने शहर में सीख सकते हैं। इस वेबसाइट पर आपको और अधिक जानकारी मिल जाएगी

    www.ishayoga.org

  • अगर आपको स्पोंडिलाईटिस है और आप इसे करना चाहते हैं तो कोई समस्‍या नहीं है। यह बिल्‍कुल सुरक्षित और आपके फायदे के लिये होगा। ईशा क्रिया का अभ्यास कोई भी कर सकता है। अगर नीचे बैठने में कठिनाई होती है तो कुर्सी पर बैठ कर भी कर सकते हैं। बस इतना ध्‍यान रहे कि एक पैर का टखना दूसरे पैर के टखने के ऊपर चढ़ा हुआ हो। चाहे आपको जो भी बीमारी हो अगर आप पूरी क्रिया करते समय आराम से बैठ सकते हैं तो इसे करने में कोई समस्‍या नहीं है।

  • बेहतर होगा कि वे विडियो देख कर ईशा क्रिया सीखें ।

  • 'आ' की ध्वनि करते समय अपना मुंह पूरा खुला रखें। अगर आप ऐसा करते हैं तो निश्‍चित रूप से आप मणिपूरक में कंपन महसूस करेंगे। शायद अनजाने में आप अपना मुंह थोड़ा बंद कर लेते होंगे। अपना मुंह पूरा खुला रखें फिर आप अंतर महसूस करेंगे।

  • आप कुर्सी पर बैठ सकते हैं। बस इतना ध्‍यान रहे कि एक पैर का टखना दूसरे पैर के टखने के ऊपर चढ़ा हुआ हो।

  • यह ध्यान आप कहीं भी कर सकते हैं, केवल ये ध्यान रखें कि क्रिया के दौरान कोई विघ्‍न ना डाले। एक शांत जगह अच्छी रहेगी लेकिन यह कोई जरूरी नहीं है। अगर कोई और विकल्प न हो तो जहाँ आप रहते हैं वहीं कर सकते हैं । महत्वपूर्ण यह है कि आप क्रिया करने के दौरान कोई ब्रेक न लें, इससे अभ्‍यास के समय चल रही ऊर्जा पुनर्गठन की प्रक्रिया बिगड़ जाती है।

  • आपने जो सीखा था उसे दूबारा शुरू कर सकते हैं, बशर्ते आपको सारे निर्देश याद हैं तो। नहीं तो आप दूबारा ऑनलाइन सीख सकते हैं।

  • आधी रात को छोड़कर, जब भी आपको सुविधा हो कर सकते हैं।

  • दिन में दो बार करना उत्तम होगा, एक बार सुबह और एक बार शाम में। अगर आपके पास समय है और ज्यादा करना चाहें तो कर सकते हैं।

  • 48 दिन की अवधि को मंडल कहते हैं। आपकी प्रणाली 48 दिन में एक खास चक्र से गुजरती है। आयुर्वेद में भी कुछ दवाएं 48 दिन तक दी जाती हैं जिससे की वह आपके सिस्टम में जड़ पकड़ सकें। ईशा क्रिया के बारे में भी यही लागू होता है। इसलिए यह महत्वपूर्ण है की आप इतने दिन तक नागा किये बिना अभ्यास करें।

 
 
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