महाशिवरात्रि - मन्त्र शक्ति
आधुनिक विज्ञान आज इस बात को साबित कर चुका है कि हर चीज जिसे आप अस्तित्व के रूप में जानते ह, जिसे ब्रह्मांड, तारामंडल के रूप मे जानते हैं वह सब एक ही ऊर्जा है, जिसने अपने आपको लाखों करोडों रूप में प्रकट किया है। और यह हरेक योगी के अनुभव में एक वास्तविकता है। योग का अर्थ है जुडना और योगी वह है जो अस्तित्व के एकरूपता को अनुभव कर चुका हो। योग की संपूर्ण प्रक्रिया बस यही हैं: हर एक मनुष्य को इस एकरूपता का अनुभव कराना।
जब मै योग कहता हूँ तो इससे मेरा मतलब किसी खास अभ्यास या पद्धति से नहीं है। उस असीम को जानने की इच्छा को, अस्तित्व के एकरूपता को जानने की लालसा को योग कहते हैं। आप उसे अपनी भावनावों के बल पर पा सकते हैं या फिर परिणम तक जल्दी से पहुँचने के लिए आप इस दिशा में एक व्यवस्थित ढंग से प्रयत्न कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, हर चीज अगर एक ही ऊर्जा है तो एक चट्टान और मनुष्य के बीच फर्क सिर्फ ऊर्जा के सूक्ष्मता या तीव्रता का है। हालांकि यह एक ही है, अंतर बस सूक्षमता के स्तर में है। जब यह स्थूल रूप में होता है हम उसे चट्टान कहते है, जब यह सूक्ष्मतम रूप में होता है हम इसे ईश्वर कहते हैं।
इस ईश्वरत्व को महसूस करने और जानने का अर्थ है - अपनी ऊर्जा को अपने अंदर सूक्ष्तर आयामों में ले जाना अपनी ऊर्जा को उच्चतर संभावनाओं में विकसित करना। महाशिवरात्रि की रात को इस ग्रह के उत्तरी गोलार्ध मे एक प्रकृतिक विशेष प्रक्रिया होता है जब हर मनुष्य के शरीर मे ऊर्जा का एक प्राकृतिक उमाड होता है। इस स्वाभाविक चढाव का सदुपयोग करने के लिए आपको अपना मेरुदंड को सीधा रखना जरूरी है। जिस तरह वैज्ञानिकों ने बताया है कि विकास की प्रकिया में पशुओं के लिए सबसे बडा कदम है मेरूदंड का क्षैतिज अवस्था से सीधी अवस्था में होना। इस बदलाव के बाद ही तुम्हारी बुद्धि विकसित हुई। इस रात जो भी अपने मेरुदंड को सीधा रखने के लिए तैयार है, हम उन्हें जगाये रखने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। ऊर्जा के इस प्राकृतिक चढाव को सही ढंग से उपयोग में लाकर, मंत्रोच्चारण, घ्यान आदि के द्वारा चैतन्य के करीब पहुँचा जा सकता है।
जो लोग तार्किक स्वभाव के होते हैं, स्वाभाविक रूप से वह सोचते होंगे कि मंत्रोच्चारण से क्या बदलाव हो सकता है? योग विद्या मे एक बहुत ही अद्भुत कहानी है। एक दिन एक क्रिया योगी ने जिसको कई सिद्धियाँ प्राप्त थीं, शिवजी के पास जाकर पूछा “यह क्या हो रहा है? आपके भक्तों ने क्यों शोर मचा रखा है? हर वक्त शिव शम्भो का मंत्र जपते रहते हैं। उस से क्या होगा? इस मंत्र को जपने से आखिर क्या फायदा है?”
शिवजी बोले, “चलो, हम एक प्रयोग करते है। यहाँ एक कीडा रेंग रहा है, उसके नजदीक जाकर “शिवशंभो” कहो। देखते हैं क्या होता है?” योगी उस कीडे के पास जाकर “शिवशंभो” का उच्चारण किया। तुरंत वह कीडा मर गया। योगी चकित होकर शिवजी से पूछा, “मैने तो केवल आपके नाम का उच्चारण किया, पर कीडा तो मर गया! यह क्या है? मगर, शिवजी कीडे की तरफ ध्यान न दे कर, एक उडती हुई तितली को दिखा कर बोले, “देखो वो तितली कितनी खूबसूरत है। योगी भी तितली को ध्यान से देखने लगा। शिवजी ने कहा, “इस तितली के साथ मंत्र का प्रयोग करो ”योगी ने तितली की तरफ देखते हुए बोला, “शिवशंभो” और तितली गिर कर मर गई। योगी पूरा परेशान होकर शिवजी से बोला “यह क्या हो रहा है? बस आपके नाम का उच्चारण करने से, एक-एक करके सारे जंतु मर रहे हैं। मै अब और नहीं बोलूँगा।” शिवजी ने इसे पूरी तरह से अनदेखा करके एक अनूठे हिरण की तरफ दखा जो वहाँ कूद-कूद कर खेल रहा था। शिवजी ने कहा, “देखो यह कितना प्यारा हिरण है! तुम इस हिरण के साथ मंत्र का प्रयोग करके क्यों नहीं देखते?” योगी ने जैसे ही “शिवशंभो” बोला, हिरण भी गिरकर मर गया। अब योगी ने आगे बोलने से बिलकुल इनकार कर दिया।
उसी वक्त एक भक्त अपने नवजात शिशु को लेकर शिवजी के पास आशीर्वाद लेने पहुँचे। शिवजी ने योगी से कहा “क्यों नही इस बच्चे पर मंत्र का प्रयोग करें? योगी ने कहा “नहीं नहीं। मैं ये काम नही कर सकता। पहले से ही तीन जीवों का पाप चढा हुआ है। अब मैं और नहीं कर सकता।” इस पर शिवजी बोले “कोइ बात नहीं। बोलो”। योगी ने काफी सोच विचार के बाद बच्चे के पास जाकर “शिवशंभो” मंत्र बोला। तुरंत वह नवजात शिशु उठ बैठा और कहा “हे योगी, क्या आप इस मंत्र की शक्ति नही जानते? क्या आप भगवान शिव के नाम की महिमा नहीं जानत?” इस पर योगी ने कहा, “नहीं। क्या तुम मुझे बता सकते हो?” बच्चा बोला, “हाँ। मै एक रेंगने वाला कीडा था, आप ने मंत्रोच्चारण किया और मैं एक तितली बन गया। आप ने मंत्रोच्चारण किया और मैं एक हिरण बन गया, आप ने मंत्रोच्चारण किया और मैंने मनुष्य का रूप धारण कर लिया। अब बस एक बार और मंत्रोच्चारण करें और फिर मैं देवता बन जाउँगा”।