“जीवन से आप बिलकुल अछूते रहकर जा सकते हैं, जीवन के साथ आप जिस तरह चाहें उस तरीके से खेल सकते हैं और फिर भी यह जीवन आप के साथ कुछ नहीं कर सकता, जीवन आप पर निशान नहीं छोड पाता। यही वह चमत्कार है जिसे हम हर व्यक्ति के जीवन में लाने के लिए काम कर रहे हैं”। - सद्गुरु
सन्यास
सद्गुरु जग्गी वासुदेव के वे शिष्य जो त्याग के योगिक मार्ग के लिए स्वयं को पूर्ण रूप से समर्पित करने के इच्छुक हैं, वे ब्रह्मचर्य के लिए प्रार्थी बन सकते हैं। ‘ब्राह्मण’ का अर्थ है चैतन्य, और ‘चर्य’ का अर्थ है पथ; ब्रह्मचारी चैतन्य के पथ पर चलते हैं। इस वर्ग की गहरी वचनबद्धता होती है, और प्रार्थियों को ‘ब्रह्मचारी’ बनने पर ‘सन्यास’ में अपनी अंतिम दीक्षा से पहले, सात से दस वर्षों का समय दिया जाता है। अनुशासन, आजादी और समर्पण के साथ-साथ दैनिक आध्यात्मिक अभ्यास और ईशा फाउन्डेशन की विविध परियोजनाओं व गतिविधियों की एक सुन्दर श्रृंखला में सभी मग्न रहते हैं। सौ से अधिक सुशिक्षित एवं प्रतिभाशाली युवा स्त्री और पुरुष ईशा योग केंद्र, भारत में रहकर काम करते हैं, तथा चैतन्य के पथ पर आनंद और तृप्ति के आंतरिक स्त्रोत को ढूँढते हैं।