मंदिर निर्माण के विज्ञान के अनुसार ही पुरातन एवं शक्तिशाली मंदिरों का निर्माण किया गया था, जिनमें सदैव ऐसे पवित्र जलकुण्ड बनाए जाते थे, जहाँ दर्शनार्थी मुख्य मंदिर में प्रवेश करने से पहले एक डुबकी लगाते थे। यह कुण्ड ना केवल शारीरिक स्वच्छता व ताजगी के लिए बने थे, बल्कि दर्शनार्थियों की ऊर्जा काया को भी सक्रिय एवं संवेदनशील बनाते थे, ताकि दर्शनार्थी पूर्ण रूप से ऊर्जा और कृपा को प्राप्त करने के लिए तैयार हो सके।
यह तीर्थकुण्ड, ध्यानलिंग की ‘बाहरी परिक्रमा’ की उत्तरी परिधि में स्थित है, यह एक पवित्र जलकुण्ड है। 29 मार्च 2006 को सार्वजनिक रूप से खोला गया यह अनोखा भूमिगत कुण्ड सद्गुरु द्वारा विशेष रूप से प्रतिष्ठापित किया गया था, जो कई लोगों के लिए गहन आध्यात्मिक अनुभव का स्त्रोत है। एक गुंबददार संरचना के रूप में निर्मित यह कुण्ड ध्यानलिंग मंदिर की तरह ही सौंदर्य एवं निर्माण सिद्धांतों पर आधारित है, क्योंकि इसमें भी साधारण, प्राकृतिक सामग्रियों और मिट्टी के रंगों का प्रयोग किया गया है।
विशाल ग्रेनाइट पत्थरों से तैयार किया गया यह आयताकार जल कुण्ड, धरती में 30 फुट गहराई में स्थित है। बडे-बडे पत्थर की सीढयाँ नीचे जलकुण्ड की ओर जाती हैं, जहाँ प्रचुर रंगों, आकारों और भावों में महाकुंभ मेले को दर्शाने वाले भव्य भित्ति चित्र मौजूद हैं, जो उभरी हुई एवं घुमावदार छत के ऊपर नजर आते हैं। 15वीं सदी से पहले की केरल की पारंपरिक भित्ति चित्र शैली में की गई चित्रकारी को मुख्यतः मंदिरों और महलों की दीवारों की सजावट के लिए प्रयोग किया जाता है, इन मोहक भित्ति चित्रों में केवल प्राकृतिक और सब्जियों के रंगों का प्रयोग किया जाता है।
इसका जल 660 किलो से ज्यादा वजन के जलमग्न ‘रसलिंग’ की ऊर्जा धारण किए हुए है। इस कंपायमान जल में ली गई एक डुबकी आध्यात्मिक ग्रहणशीलता को बढाकर शरीर को नवजीवन प्रदान करती है।
