“प्रत्येक आकाशगंगा का आंतरिक भाग एक दीर्घवृत्ताभ (इलिप्सॉइड) है। एक पूर्ण दीर्घवृत्ताभ को ही लिंग कहा जाता है। अतः पहला रूप, जब वह अव्यक्त से व्यक्त होता है - जब वह सृष्टि के रूप में व्यक्त होने लगता है - तब वह जो भी पहला रूप धारण करता है वो हमेशा ही एक दीर्घवृत्ताभ का रूप होता है।
अपने अनुभव से पता लगता है कि यदि तुम अपनी उर्जा को एक निश्चित स्तर तक उठाते हो, तो विसर्जन से पहले तुम्हारी उर्जा जो भी अन्तिम रूप धारण करती है वह भी दीर्घवृत्ताभ ही होता है।
अतः दोनों छोर से, लिंग को परे के मुख्यद्वार के रूप में देखा जाता है। प्रकटीकरण का पहला रूप एक दीर्घवृत्ताभ है। विसर्जन का अन्तिम रूप भी एक दीर्घवृत्ताभ है। अतः सृष्टि का आरंभ व अंत लिंग ही है, इसलिए इसे पार जाने के मुख्यद्वार के रूप में देखा जाता है”। ” - सद्गुरु
संस्कृत में, ‘लिंग’ का अर्थ है ‘रूप’ या ‘आकार’।
‘लिंग’ एक पूर्ण दीर्घवृत्ताभ है। यह एक ऐसा रूप है जो ऊर्जा प्राप्त करने पर ऊर्जा का शाश्वत भंडार बन जाता है। यद्यपि भारतीय पुराणों में यह आम तौर पर शिव के साथ जुडा है, परन्तु वैज्ञानिक रूप से, केवल यही वह आकार है जो उर्जा के शाश्वत भंडार के रूप में काम कर सकता है।
लिंग के निर्माण का योगिक विज्ञान इसी ज्ञान पर आधारित है। ध्यानलिंग की प्रतिष्ठा के दौरान, प्राण प्रतिष्ठा की एक गहन प्रकि्रया के द्वारा, मानव प्रणाली के सातों चक्रों की ऊर्जा को परम शिखर तक उठाकर बंद कर दिया गया, ताकि समय के साथ ऊर्जा का क्षय न हो। इसी वजह से ध्यानलिंग में कोई पूजा-पाठ या धार्मिक विघि-विधान नहीं किए जाते हैं। उम्मीद की जाती है कि ध्यानलिंग की ऊर्जा का कम से कम 5000 वर्षों तक क्षय नहीं होगा।
सद्गुरु इसका वर्णन इस तरह करते हैं कि, लिंग रूप ऊर्जा को अपनी उच्चतम तीव्रता तक उठने में सहायक है, जहाँ यह अपने रूप को कायम रख सकती है। उसके परे, यह निराकार हो जाती है। ध्यानलिंग का भौतिक रूप काला ग्रेनाइट पत्थर है जो इस ऊर्जा को सिर्फ सहारा प्रदान करता है। अगर इसे हटा भी लिया जाए तो भी यहाँ मौजूद ऊर्जा रूप को नष्ट नहीं किया जा सकता। यह सभी के लिए हमेंशा मौजूद एवं उपलब्ध रहेगा।
ध्यानलिंग योगिक विज्ञान का सार है, तथा आतंरिक ऊर्जाओं की चरम तीव्रता की बाह्य अभिव्यक्ति है।