भारतीय समाज में मंदिरों ने हमेशा से एक केंद्रीय भूमिका निभायी है।
भारतीय समाज में मंदिरों ने हमेशा से एक केंद्रीय भूमिका निभायी है। शिक्षा, कला और संस्कृति के मुख्य विषय होने के अलावा, इन मंदिरों ने शक्तिशाली ऊर्जा केंद्रों की तरह भी काम किया है। प्राचीन मंदिरों का निर्माण प्रार्थना करने वाली जगह के रूप में नहीं किया गया था, बल्कि इन्हें ऊर्जा के भंवर के रूप में बनाया गया था जहाँ अगर लोग ग्रहणशील और इच्छुक हों, तो वे अपने आपको बहुत गहन रूप में रूपांतरित कर सकते हैं।
इन मंदिरों की रूपरेखा एवं निर्माण की प्रकिया बहुत जटिल थी तथा भौतिक और अभौतिक तत्वों को शामिल करके जटिल गणना के द्वारा निर्मित किए गए थे। उदाहरण के लिए, ‘गर्भ गृह’ के साथ-साथ मंदिर की ‘परिक्रमा’, प्रतिमा का रूप और आकार, प्रतिमा द्वारा ली गई मुद्रा तथा मंदिर को प्रतिष्ठित करने के लिए प्रयोग किए गए मंत्र, ये सभी उसकी रूपरेखा के मौलिक मापदण्डों को तय करते हैं।
मानव प्रणाली की आंतरिक ऊर्जाओं की गहरी समझ के आधार पर, इन तत्वों को आंतरिक रूपांतरण के एक शक्तिशाली स्थान की रचना के उद्देश्य से बनाया गया था। उदाहरण के लिए, भारतीय संस्कृति में आज भी यह समझा जाता है कि जब हम मंदिर में दर्शन करने जाता हैं तो वहाँ कुछ समय के लिए शांति से बैठना चाहिए। पूजा या उपासना को सर्वश्रेष्ठ नहीं माना जाता लेकिन अगर एक व्यक्ति मंदिर में कुछ समय बैठे बिना ही वहाँ से चला गया था, तो समूची यात्रा निष्फल मानी जाती थी।
ऐसा इसलिए है क्योंकि मंदिरों का निर्माण लोगों को ऊर्जा प्रदान करने के लिए किया गया था, जहाँ लोग आंतरिक ऊर्जा से खुद को चार्ज कर सकते थे। लोग अपने दिन की शुरूआत करने से पहले हर रोज मंदिर में दर्शन करने जाते थे, ताकि वे संतुलन और गहराई के उन्नत भाव में अपना दैनिक जीवन जी सकें।
बाद में जाकर, मंदिरों की मौलिक समझ एवं उनके निर्माण व प्रयोग के पीछे छिपे विज्ञान ने धार्मिक विधि-विधानों और परंपराओं को जन्म दिया, और अब मंदिर प्रार्थना एवं उपासना के स्थान अधिक बन गए हैं।
ध्यानलिंग योगिक मंदिर अपने आप में अनोखा है, क्योंकि योग के आंतरिक विज्ञान के जरिए, एक गहरी समझ एवं आंतरिक ऊर्जाओं पर दक्षता के साथ सद्गुरू द्वारा इस मंदिर को बनाया और प्रतिष्ठित किया गया है।