ईशा जेल कार्यक्रम में स्वयंसेवकों के अनुभव
उनके अनुभव
एक शांति छा गई - विल ग्रिफिन्स द्वारा
विनम्रता और कृतज्ञता - रुबका तमरात द्वारा
आंतरिक आजादी - कैरालिन रीज द्वारा
अद्भुत कृपा - डौग लाँगमोर
बाधाएँ - कोई बाधा नहीं हैं - कृष्णन वेंकटरमन द्वारा
जेल कार्यक्रम में एक शांति छा गई
विल ग्रिफिन द्वारा
लाग्रेंज, KY - USA में लूथर लकेट करेक्शनल कॉम्पलेक्स में - कैदियों के लिए आंतरिक आजादी - जेल योग कार्यक्रम में सद्गुरु जग्गी वासुदेव और कैदियों के वृत्तांत।
जेल के अंदर का कठोर जीवन - कंक्रीट दीवारें, भवन, फर्श और स्टील के दरवाजे, जेल में बंद कैदियों को कुछ भी लाभ नहीं पहुँचाते हैं। ये वो मनुष्य हैं जिन्होंने अपने लिए ऐसे विकल्प चुने हैं जिनसे उनका जीवन कठोर दिनचर्या और सीमित संभावनाओं में सिमट कर रह गया है। वे अपनी बाह्य परिस्थितियों पर नियंत्रण खो चुके हैं। परंतु उनके लिए अपने अंदर एक अनोखा अनुभव करने का अवसर अमरीका के जेल के दरवाजे पर आ पहुँचा। भारतीय योग गुरु सद्गुरु जग्गी वासुदेव कैदियों के जीवन को रूपांतरित करने के लिए पेंसिल्वेनिया और केंटकी के जेलों में अपने कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। अमरीका में तो कार्यक्रम की यह एक शुरूआत है क्योंकि सख्त भारतीय जेल प्रणाली में जिन लोगों का सबसे निष्ठुर रूप देखा गया था, वह अब रूपांतरित इंसान बन गए हैं। पिछले दस वर्षों में यह असाधारण योगी अपनी शक्तिशाली, गूढ प्रक्रियाओं को दक्षिण भारत के जेलों में ले गए हैं, जिससे हिंसक को शांतिपूर्ण बनते हुए, निद्राहीन को शांति से सोते हुए, उपद्रवी को शांत बनते हुए देखा गया, एवं 130 वर्षो में पहली बार कालकोठरियों को खाली देखा गया। ऐसे कठोर जीवन से चोट खाए लोगों को योग क्या प्रदान कर सकता है? 2002 की गरमी के अत्यंत गर्म दिनों के दौरान केंटकी की जेल प्रणाली में सप्ताह भर लंबे कार्यक्रम में जो हुआ था यहाँ उसके कुछ अंश दिए गए हैं।
सद्गुरु ने वर्ष के आरंभ में जेल कर्मियों व कैदियों से छोटी सी भेंट के साथ मूल कार्य की नींव रखी थी जिसमें उन्होंने अपना और अपने काम का परिचय दिया था। इस कार्य ने करीब 50 कैदियों का ध्यान आकर्षित किया था जो योग करने के साथ-साथ सप्ताह के सभी कार्यक्रमों के लिए तैयार हुए थे। औसत कद-काठी के इस दुबले-पतले मानव की करिश्माई उपस्थिति में मायूस लोगों को भी आकर्षित करने की क्षमता है। उनके चेहरे पर प्राचीन भारतीय योगी जैसी दाढी है, उनकी आँखें चमकीली और आकर्षक हैं, और जब वह बोलते हैं, तो तीक्ष्ण उद्देश्य व स्पष्टता के साथ बोलते हैं।
सख्त-पत्थर की फर्श वाली एक व्यायामशाला पर यह कार्यक्रम किया गया था। सद्गुरु शांतिपूर्वक अपनी कुर्सी पर बैठे, और उनके पास केवल एक माइक्रोफोन ही था। सुनाने के लिए थोडा जोर से बोलना ही काफी था परंनु उन्होंने नरमी से, धीरे धीरे अकाट्य तर्क से प्रश्नों का उत्तर दिया और लोगों का ध्यान आकर्षित किया। सद्गुरु ने उपस्थित लोगों पर इस बात का जोर डाला कि उनके प्रश्नों का उत्तर दिया जाय और इस तरह से उन्होंने लोगों को प्रक्रिया में शामिल किया। सद्गुरु ने उन्हें असहमत होने, तथा उनके भीतर उठे भावों को व्यक्त करने के लिए उन्हें आजादी दी। अगर वे लोग सद्गुरु से नाराज होते, तो उन्हें खडे होकर उन पर चिल्लाने की आजादी थी, लेकिन उसके बाद, वे लोग फिर से बैठ कर ध्यान देने लगे। यह स्पष्ट था कि समूह में संशय, विरोध, अधीरता, ऊब, आशा और उत्सुकता का मिश्रण मौजूद था। वहाँ जवान से लेकर बूढे लोग मौजूद थे; सख्त, मांसल, उग्र लोगों से लेकर पतले निर्बल लोग, सजग लोग जिनके पास कहने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था; समाज के हत्यारों, ड्रग वितरकों, बलात्कारियों और जेबकतरों का खतरनाक समूह मौजूद था। लेकिन सद्गुरु जग्गी वासुदेव के लिए ये सब शांतिपूर्ण, आनंदित इंसान बनने की संभावनाएँ हैं।
जब इन लोगों को उनके भीतर एक नया स्थान दिखाया गया तब जहाँ ये थे वहाँ से उनको आगे बढाने की प्रक्रिया में, अपने कठोर विचारों की परतों को, जिनमें वो लोग जकडे हुए थे, उसे गिराकर दूर करना था। जब शिक्षक ने यह बताया कि कोई भी व्यक्ति चौबीस घंटे पूरा अच्छा या पूरा बुरा नहीं रहता, तब एक निष्ठुर युवक ने बीच में कहा कि वह बहुत बुरा था। शिक्षक ने उस युवक को अपने सम्मुख बैठने के लिए आमंत्रित किया। वह विमुख युवक चेतनतापूर्वक सामने आकर बैठ गया, हर व्यक्ति का ध्यान इसी आदमी पर था, शिक्षक ने सौम्य भाव से बताया कि सार्वजनिक ढंग से साहस और ईमानदारी से यह कहना कि मैं एक बुरा व्यक्ति था इसके अंदर के अच्छे गुण को दर्शाता है। उसके चेहरे पर उलझी हुई लेकिन मोहित आभा ने यह दर्शाया कि एक बुरे इंसान के रूप में इस युवक की पहचान का खुलासा करना निश्चय एक सुधारात्मक कदम था। उस समूह के लिए यह समय गहन व चुनौतीपूर्ण था, तथा बातों के एक लंबे सत्र व उनकी सोच में असंगतताओं को प्रकट करने के बाद, अब समय था एक सक्रिय खेल के जरिए उनको वापस उनके शरीर में लाना। यह उस सहज प्रक्रिया का भाग है जिससे उन लोगों को एक दूसरे के साथ अनंद में अनुभव करने के लिए चीजों को देखने के सामान्य तरीके से बाहर निकाला जाता है, यह एकीकृत तरीका है। कैदियों के लिए यह बहुत स्पष्ट हो गया था, कि यह योगी प्रभावहीन नहीं था। वह पूर्णतः, तीव्रता से खेल में शामिल हुए थे, और उन्होंने अपने शांत बाह्य स्वरूप के विपरीत उग्र शक्ति के साथ गेंद को फेंका था। खेल के अंत में उन लोगों ने आकर स्पष्ट रूप से इस अनोखे मनुष्य का आदर किया एवं अगले दिन के कार्यक्रम के संबंध में बहुत उत्सुक दिख रहे थे।
अब कैदियों को अगली कक्षा में जिम्मेदारी का सामना करना था। सद्गुरु वासुदेव ने उन लोगों को ऐसे विचार से परिचित कराया जिससे उनके अपने ही शरीर व मन की सीमाओं के परे जिम्मेदारी बढ जाती है। अगर वो लोग संसार के प्रति उत्तरदायी होते हैं तो चाहे जो भी परिस्थिति हो, वो अपने लिए और दूसरों के लिए सक्रिय हो सकते हैं तथा देख सकते हैं कि जीवन के लिए प्रतिक्रिया देने के बजाए उसको अनुकूल बनाने का चयन करने की संभावना उनके अंदर ही है। इससे उन लोगों में एक आनंदित इंसान बनने की योग्यता आती है और हर पल एक विकल्प होता है। उन्होंने सूर्य नमस्कार सीखकर अपने योग अभ्यासों के भौतिक पहलू को आरंभ किया था। बारह मुद्राओं में किए जाने वाले इस आसन से पूरे शरीर की कसरत हो जाती है, तथा दिन की बैठक के लिए उनकी ऊर्जाएँ जागृत हो जाती हैं। सूर्य नमस्कार के बाद उन्होंने शवासन में विश्राम किया। पीठ के बल हथेलियों को खोलकर चेहरे को ऊपर करके लेटने की यह सरल अवस्था उन लोगों के लिए एक प्रवेशद्वार थी जिन्होंने संभवतः अपने जीवन में पहली बार इसका अनुभव किया था, वे लोग जिन्होंने सोचा कि वे पिछले अनुभव पर आधारित थे एवं वे लोग जो वास्तव में वर्तमान पल में हैं उनके बीच थोडा सा ही अंतर था। उस स्थान में उतरी यह शांति अपनी प्रशस्त नीरवता के लिए विलक्षण थी, और यह अवास्तविक था कि इन असभ्य मनुष्यों ने योग द्वारा रूपांतरित होना शुरू कर दिया था।
कार्यक्रम सद्गुरु द्वारा आगे की ताकिर्क चुनौतियों और सक्रिय खेलों के साथ साथ दूसरे योगिक अभ्यासों के साथ निरंतर जारी रहाA वह कैदी सांस लेने के सरल अभ्यासों को सीखकर गहराई तक योग की शक्ति में चले गए थे, इन अभ्यासों में मुद्रा, या हाथ की मुद्राएँ, और अभ्यास करने वालों की साधारण ध्वनियाँ शामिल थीं, जिनमें शरीर में मौजूद ऊर्जा को बदलने की गहन शक्ति है। इससे हर व्यक्ति में यह प्रभार लेने की क्षमता बढ जाती है कि संसार में अपनी जीवन ऊर्जाओं को कैसे प्रयोग किया जाए। वे मनुष्य विमुख, सजग, सतर्क, और अस्थिर होने के बजाए, उत्सुक एवं इच्छुक खिलाडी बनते चले गए जो अपनी चटाई पाने के लिए सुबह कमरे में व्यावहारिक रूप से फूट पडते थे। गुरु की वचनबद्धता के प्रति थोडे और प्रोत्साहन के साथ, कैदी शीघ्रता से बडे उपहार के लिए ज्यादा केंद्रित और सचेत हो गए थे जो उनको प्रदान किया गया था। पाँचवीं सुबह, सभी निर्देश के अगले स्तर की प्रतीक्षा करते हुए शांति से व ध्यानपूर्वक इकट्ठे हुए।
समय और व्यवस्था की सीमाओं के साथ भी, सद्गुरु इन कैदियों को ऐसे एकाग्र एवं प्रबल योग अभ्यास सिखाने में सक्षम थे जिनको दैनिक जीवन में शामिल करना सरल और आसान होता है। उन कैदियों को अपने प्रतिरोधों का सामना करते हुए देखना, रोज अपने विचारों को चुनौती देना, तथा शरीर को ऐसे तरीकों में काम करने के लिए कहना जो अप्रचलित थे, यह सब बहुत प्रेरणाप्रद था। उन्होंने कडी मेहनत करके जल्दी ही उन लाभों का अनुभव किया जो प्रतिबद्ध योग अभ्यास करने से ही मिल सकते हैं।
आखिरी सुबह उस समूह को सद्गुरु द्वारा पूर्ण अभ्यास कराते हुए देखा गया, और वह व्यक्ति जिसने कैदियों को कार्यक्रम के पहले दिन देखा था उसके लिए यह देखना विस्मय व खुशी का दृश्य था कि किस तरह कैदियों में एक हफ्ते में ही परिवर्तन आ गया था।
अपने ही व्यवहार को बनाए रखने के लिए व्यक्तियों ने जो कडी कोशिश की थी उसकी उथल-पुथल व असंबद्धता दूर चली गयी थी। ये मनुष्य शांत और केंद्रित बन गए थे, तथा उद्देश्य की संबद्धता हवा में प्रतीत हो रही थी। वो सभी अपने अंर्तभाग में किसी नयी चीज का अनुभव कर रहे थेः अपनी पुरानी कहानियों से निरपेक्ष, वो लोग सच में कुछ और ही हैं।
वह साप्ताहिक कार्यक्रम एक शांत व हृदय स्पर्शी सामारोह के रूप में समाप्त हुआ जिसमें हर व्यक्ति को सद्गुरु के पास आकर आर्शीवाद प्राप्त करने के लिए आमंत्रित किया गया था। हर व्यक्ति अपना उपहार पाने और सद्गुरु के गले लगने के लिए गहरे आभार के साथ शांतिपूर्वक उनके पास पहुँचा तथा यात्रा के आरंभ में उन लोगों ने जो कल्पना की थी वही उनको दिया गया थाः उन सभी के भीतर चैतन्य का अनुभव।
विल ग्रिफिन ईशा संस्थान के एक स्वयंसेवक हैं जो टेनेसी, नाशविले से हैं