प्रकाशित पुस्तकें


चाहो! सब कुछ चाहो


"लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं, 'बुद्ध ने कहा इच्छा न करो। लेकिन आप तो कहते हैं-सारा कुछ पाने की इच्छा करो। यह विरोधाभास क्यों है?' जो अपने जीवन-काल के अंदर समस्त मानव-जाति को ज्ञान प्रदान करने की इच्छा करते रहे, क्या उन्होंने लोगों को इच्छा का त्याग करने को कहा होगा? कभी नहीं। बड़ी से बड़ी इच्छाएँ पालिए। उन्हें पाने के लिए सौ फीसदी लगन के साथ कार्य कीजिए। ध्यानपूर्वक इच्छा का निर्वाह करेंगे तो वांछित मनोरथ पा सकते हैं।" – सदुगुरु

अत्यंत लोकप्रिय साप्ताहिक 'आनंद विकटन' में एक वर्ष-पर्यंत धारावाहिक रूप से निकलकर, फिर पुस्तकाकार प्रकाशित सद्गुरु के वचनामृत अब आपके हाथों में हैं - 'चाहो! सब कुछ चाहो' ये हैं जीवन की बाधाओं को जीतकर, वांछित मनोरथ प्राप्त करते हुए संपूर्ण जीवन जीने की राह बताने वाले अनमोल वचन; जीवन में कायाकल्प लाने वाले अमोघ वचन।

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आत्मज्ञान: आखिर है क्या


‘अगर आप इसके बारे में जागरूक नहीं हैं, तो मैं यह बताना चाहूँगा कि 90 प्रतिशत लोगों के लिए उनके आत्मज्ञान प्राप्त करने का वक्त और उनके शरीर छोडने का वक्त एक ही होता है। केवल वही लोग जो शरीर के दाँव-पेंच जानते हैं, जो इस शरीर रूपी यंत्र के विज्ञान को जानते हैं, जो शरीर के कल-पुर्जे की समझ रखते हैं, वही अपने शरीर में बने रहने में सक्षम होते हैं।

अपने शरीर में बने रहने में जो लोग सक्षम होते हैं, उनमें से ज्यादातर लोग अपना बाकी जीवन मौन में ही बिताते हैं। केवल कुछ ही इतने मूर्ख होते हैं जो अपने इर्द-गिर्द के लोगों के साथ कुछ करना चाहते है, क्योंकि उस आयाम के बारे में बात करना जो लोगों के अनुभव में नहीं है, यह बहुत निराशाजनक है। लोग तर्क के आधार पर इसे स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं, पर यह बेहद निराशाजनक चीज है...’

-सद्गुरु

सद्गुरु उन दुर्लभ लोगों में से एक हैं, जो न केवल उस अनुभव के बाद जीवित रहे और उसका स्पष्ट बयान किया, बल्कि उन्होंने मानवता को एक शाही मार्ग प्रदान किया और उस दिशा में एक मौन क्रांति की शुरुआत की। इस पुस्तक में संकलित सत्संग एक ऐसे विषय के गूढ पहलू को उजागर करते है, जो लोगों की कल्पना को पहले से कहीं अधिक मुग्ध करने लगा है। एक रहस्यदर्शी, युगद्रष्टा, मानवतावादी, सद्गुरु एक अलग किस्म के आध्यात्मिक गुरु हैं।

प्रकाशकः डायमंड बुक्स

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एक आध्यात्मिक गुरु का अलौकिक ज्ञान


लोगों के जीवन में अक्सर एक पल आता है जब पूर्ण विराम गायब हो जाते हैं। प्रश्न चिह्न उठ खडे होते हैं। विराम-चिह्नों का सिलसिला शुरू होता है। अँगडाई लेते हुए अंतहीन, अथाह विराम चिह्न...। यही वह वक्त होता है जब एक व्यक्ति एक जिज्ञासु बन जाता है। यह पुस्तक जिज्ञासुओं के लिए, अन्वेषकों के लिए है। यह विकल, व्यग्र और विवह्ल कर देने वाले प्रश्नों के सरगम का एक संकलन है, जो हरेक जिज्ञासु के मन में कभी न कभी जरूर उठते हैं। प्रश्न अनेक विषय वस्तुओं से संबंधित हैं - भय, कामना, कष्ट और पीडा, निष्ठा, स्वतंत्र इच्छा शक्ति, नियतिवाद, ईश्वर, विश्वास, प्रेम, नैतिकता, आत्म-वंचना, असमंजस, कर्म, आध्यात्मिक-मार्ग, मन, शरीर, रोग, आरोग्यता, पागलपन, मृत्यु, विसर्जन। प्रश्न और भी हैं।

उत्तर सद्गुरु जग्गी वासुदेव के द्वारा दिए गए हैं जो कि हमारे समय के एक बुद्ध-पुरुष और दिव्यदर्शी हैं। अविचल, अपने आंतरिक अनुभव में आरूढ, ये किसी संगठित धार्मिक, साम्प्रदायिक या सिद्धांतवादी परम्परा से संबंध नहीं रखते। बिल्कुल स्पष्ट, हास्यपूर्ण, अपरंपरागत, उकसानेवाले लेकिन असीम करुणा से परिपूर्ण, उनके ये उत्तर अंतरंग शिष्यों के बीच, दस वर्षों से भी अधिक समयांतराल में, विभिन्न अवसरों पर मुखरित हुए थे। उन्होंने विविध विषयों पर अपनी अंतरदृष्टि और ज्ञान बाँटा है, जिन पर किसी सार्वजनिक सभा में वे शायद ही कभी चर्चा करते हैं। उनके ये शब्द उन थोडे से लोगों में - जिन्हें एक लंबे समय से उनके सान्निध्य का सौभाग्य प्राप्त रहा है - विकास को पोषित करने हेतु संप्रेषित किए गए थे। आत्मीय स्वर, तालबद्ध वार्तालाप, तथा विशिष्ट प्रसंग - यही इस पुस्तक की विशिष्टता है। प्रत्येक संस्कृति और संप्रदाय के जिज्ञासु, बिल्कुल प्रथम पृष्ठ से ही स्वयं को एक तटस्थ श्रोता से संवाद में एक सहभागी बनता हुआ महसूस करेंगे। उत्तर स्वयं में एक असंदिग्ध प्रामाणिकता की झंकार, एक गहरी स्पष्टता और उनके ज्ञान को धारण किए हुए हैं, जो यह जानते हैं कि खोजने का अर्थ क्या होता है। और जानना क्या होता है। और कैसे इन दोनों के बीच की एक दुःसाध्य और प्रायः छोर-रहित यात्रा को नियोजित और सुगम बनाया जाए।

प्रकाशकः जयको पब्लिशिंग हाउस

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मृत्यु एक कल्पना है


”अपने शरीर से परे प्राणी का आगे बढना, इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह संसार में क्या था, और वह अपने बारे में क्या सोचता था या सब लोग उसके बारे में क्या सोचते थे। यह सिर्फ इस पर निर्भर करता है कि वह कितना जागरूक है, उसने अपने अंदर इस भौतिक शरीर के परे कितना कुछ पैदा किया है।” - सद्गुरु

सद्गुरु हमारे समय के एक दिव्यदर्शी और एक योगी हैं। इनके साथ एक आत्मीय भेंट के दौरान श्रोताओं के एक दल ने अपनी जिज्ञासाओं को ही नहीं, बल्कि अपनी आशंकाओं को भी उनके साथ बाँटा। इन्हीं जिज्ञासाओं को इस पुस्तक में समेटा गया है। पुस्तक के प्रथम खंड में सद्गुरु मृत्यु के संबंध में आदि काल से चली आ रही भीतियों की खोज करते हैं। वे उनका सर्व मर्ज नाशक औषधियों की तरह सांत्वनाप्रद समाधान देने की कोशिश नहीं करते, बल्कि एक ज्ञानी की तथ्यात्मक अंतर्दृष्टि को सामने रखते हैं।

पुस्तक के दूसरे खंड में, वह हमें दुनिया देखने के अपने औपचारिक, परम्परागत नजरिये - हमारे अच्छे और बुरे के ख्याल जिससे दुनिया खंडित हो गई है - को ध्वस्त करने के लिए प्रेरित करते हैं। इसका परिणाम है एक ऐसी पुस्तक जो साधकों के लिए आह्लादकारी है। एक ऐसी पुस्तक जो अनेक महत्वपूर्ण प्रश्नों का सार्थक एवं सटीक उत्तर देती है।

प्रकाशकः डायमंड बुक्स

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सृष्टि से सृष्टा तक


पुस्तक के प्रथम खंड में सृष्टि के द्वैत की चर्चा की गई है, जिसकी जटिलताओं और विविधताओं में उलझा हुआ मनुष्य बुरी तरह से घायल हो चुका है। द्वैत ही उसके जीवन में रंग भरता है, जीवन के समस्त खेल, सौन्दर्य और खुशी का कारण द्वैत ही है। लेकिन इसके लिए उसे एक बहुत भारी कीमत चुकानी पडी है, द्वैत के कारण ही वह सभी तरह के दुःख, कष्ट और मुश्किलों में फँसा हुआ है। सद्गुरु इससे निकलने की उक्ति बताते हैंः ”अगर तुम उस आयाम में स्थापित हो जो सृष्टि का उद्गम है; अगर तुम्हारा एक हिस्सा सृष्टा और दूसरा हिस्सा सृष्टि है, फिर तुम सृष्टि के साथ जैसे चाहो वैसे खेल सकते हो, लेकिन यह तुम्हारे ऊपर कोई भी निशान नहीं छोडेगी।”

दूसरे खंड में सद्गुरु महत्वपूर्ण चेतावनी भी देते हैं: जब इंसान एक खास स्तर की सिद्धि प्राप्त कर लेता है, तो उसके अंदर करुणामय होने की प्रबल इच्छा जागती है। वह इस पृथ्वी के हर जरूरतमंद की आवश्यकताओं को पूरा करना चाहता है। यह किसी प्रकार की समझदारी, बुद्धिमानी, या जागरूकता से उत्पन्न नहीं होती। यह सर्वश्रेष्ठ बनने की चाहत से पैदा होती है। भवसागर की रोमांचकारी यात्रा पर निकले यात्रियों के लिए यह पुस्तक चैतन्य को उपलब्ध एक अनुभवी नाविक की प्रज्ञा से जुडने का एक दुर्लभ अवसर प्रदान करती है।

प्रकाशकः डायमंड बुक्स

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दिव्‍यदर्शी की आँखन देखी


यह पुस्तक प्यासों के लिए है। और निश्‍चित रूप से यह पुस्तक कायरों के लिए नहीं है। हमारे समय के एक जीवंत गुरु और दिव्यदर्शी, सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने एक गहन तथा व्यापक संवाद की शृंखला में उन सभी गूढ़ प्रश्‍नों को संबोधित किया है जिनकी कल्पना कोई जिज्ञासु कर सकता है। प्रश्‍न आत्मज्ञान, मुक्ति, मृत्यु, ईश्‍वर और पुनर्जन्म से संबंधित हैं। साथ ही वे भी प्रश्‍न हैं जो दिखते तो बड़े मामूली हैं, लेकिन सबको आतंकित करते हैं तथा जिनको जानने की उत्सुकता सब में होती हैं, परंतु पूछने में लोग झिझकते हैं: ये भूत-प्रेत, भटकती आत्माएँ, जादू-टोना, कायाहीन प्राणी, फरिश्‍ते, दानव, गुह्य विद्या इत्यादि से संबंधित हैं। जब सद्गुरु तीन जीवन कालों की अपनी असाधारण प्रतिबद्धता व दुःसाहस और अपने जीवन के एकमात्र ध्येय की ऐतिहासिक गाथा को उजागर करते हैं तब यह पुस्तक अपने विषय-वस्तु की चरम सीमा को छूती है। उनकी इस दुःसाहसी यात्रा का परिणाम है ध्यानलिंग, जो सदियों से असंख्य योगियों का स्वप्न रहा है। ध्यानलिंग ऊर्जा का एक अनूठा रूप है, जो अपने दायरे में आने वाले हर एक व्यक्ति में मुक्ति का बीजारोपण करता है।

यह पुस्तक सँजोने के लिए है। यह ज्ञान के एक जीते-जागते दिव्यदर्शी की, एक विलक्षण विद्या-निधि की, एक आधुनिक दिव्यदर्शी के लोक की अपूर्व झलक प्रदान करती है। यद्यपि अपनी चर्चा के दौरान सद्गुरु अतर्क के सुदूर छोर को छूते है, तथापि अपनी प्रज्ञापूर्ण, विशुद्ध वाकशैली के कारण अत्यंत काल्पनिक विषयों पर बोलते हुए भी वे कभी अपनी प्रामाणिकता नहीं खोते। इसका परिणाम है एक अनोखा नज़रिया - उस जगत के प्रति जिससे आप परिचित हैं, या कम से कम आप सोचते हैं कि आप परिचित हैं! दिव्यदर्शी की आँखों से - अद्भुत, अतुल्य अंतर्दृष्टि और तीक्ष्ण स्पष्टता के दिव्य चक्षु से - जगत रूपांतरित होता है। एक ऐसा जगत जो आपको स्मरण दिलाता है कि ‘इस पृथ्वी पर, औैर स्वर्ग में भी, आपकी कल्पना से परे, आपके विचारों से परे, बेशुमार, ढेरों... चीजें हैं।’

प्रकाशकः जयको पब्लिशिंग हाउस

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